न्यू वर्ल्ड ऑर्डर-02 : उस्मानी ख़लीफ़ा की हिंदुस्तान को लेकर बड़ी चूक
उस्मानिया ख़िलाफ़त को हिंदुस्तान की रियासतों के मुस्लिम बादशाहों-नवाबों ने भी क़ुबूल किया था। सत्ता पर बैठते ही ये सुल्तान ख़लीफ़ा से मंज़ूरी की मोहर लगवाते थे। लेकिन तुर्की में बैठे उस्मानी ख़लीफ़ा ने कभी हिंदुस्तान में बढ़ते अंग्रेज़ी हस्तक्षेप के ख़तरे को महसूस नहीं किया। उनकी सबसे बड़ी चूक थी टीपू सुल्तान की मदद न करना। आज हम इतिहास के एक ऐसे ही पन्ने को उलटकर देखने की कोशिश करेंगे।
(उस्मानी ख़लीफ़ा उस्मान सालिस (तृतीय))
23 जून 1757 को मीर ज़ाफ़र को ग़द्दारी पर उभारकर अंग्रेज़ों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर, पहली बार भारत की किसी रियासत पर क़ब्ज़ा किया था लेकिन उस ख़तरे को उस्मानी ख़लीफ़ा उस्मान सालिस (तृतीय) ने नज़रअंदाज़ कर दिया था।
बंगाल पर क़ब्ज़ा करने के बाद अंग्रेज़ों ने अपने क़दम दक्षिण भारत की ओर बढ़ाए जहाँ मैसूर के नवाब हैदर अली की ताक़त बढ़ रही थी और इस बढ़ती ताक़त से हैदराबाद रियासत के निज़ाम भी ख़ौफ़ज़दा थे। बंगाल से मैसूर के बीच एक बड़ी रियासत थी, हैदराबाद जहां आसफ़ज़ाही निज़ाम की हुकूमत थी।
(हैदराबाद रियासत का झण्डा)
हैदराबाद रियासत के झंडे के ऊपर लिखा था, अल अज़्मतु लिल्लाह (महानता अल्लाह के लिये है) बीच में आसफ़ज़ाही जो कि हैदराबाद निज़ाम का ख़ानदान था और नीचे लिखा था, या उस्मान। शायद यह उस्मानिया ख़िलाफ़त से उनके जुड़ाव का प्रतीक था।
मराठों के साथ आए दिन होने वाले युद्धों के चलते हैदराबाद के निज़ाम ने अंग्रेज़ों से लड़ना मुनासिब नहीं समझा। इससे अंग्रेज़ों की हिम्मत और बढ़ी और वे आस-पास की छोटी-बड़ी रियासतों पर अपनी रिमोट कंट्रोल सरकार बिठाते हुए दक्षिण भारत पहुंचे।
मैसूर रियासत उनकी आँखों में खटक रही थी। दास्तान लम्बी है, इसलिये हम सीधे उसी मुद्दे पर बात करेंगे जो हमारे आज के आर्टिकल का टाइटल है।
29 दिसंबर 1782, मैसूर के नवाब हैदर अली की मौत के बाद, उनके बेटे मीर फ़तेह अली ख़ान ने सल्तनत सम्भाली, जिन्हें इतिहास टीपू सुल्तान के नाम से जानता है। टीपू सुल्तान ने मैसूर (वर्तमान नाम कर्नाटक) की गद्दी पर बैठने के बाद एक विशेष दल कुस्तुनतुनिया (वर्तमान नाम इस्ताम्बुल) भेजा था ताकि उस वक़्त के ख़लीफ़ा सलीम सालिस (तृतीय) से अपनी सल्तनत के लिये मंज़ूरी ले लें।
ख़लीफ़ा सलीम सालिस (तृतीय) ने मंज़ूरी दे दी और टीपू सुल्तान को अपने नाम का सिक्का ढालने और जुमे के ख़ुत्बे (जुमे की नमाज से पहले इमाम द्वारा पढ़ी जाने वाली तक़रीर) में अपना नाम पढ़वाने की इजाजत दे दी थी।
(उस्मानी ख़लीफ़ा सलीम सालिस (तृतीय))
मार्च-अप्रैल 1799 में मैसूर के चौथे युद्ध की तैयारी हो चुकी थी। टीपू सुल्तान ने उस्मानी ख़लीफ़ा सलीम तृतीय से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिये मदद माँगी। ख़लीफ़ा ने कोई मदद नहीं की और टीपू सुल्तान को बेसहारा छोड़ दिया। 4 मई 1799 को, मैसूर का शेर टीपू सुल्तान, अपने दम पर अंग्रेज़ों से लड़ते हुए शहीद हो गया। उस वक़्त अंग्रेज़ कमांडर ने कहा था, आज हमने हिंदुस्तान जीत लिया।
हमेशा की तरह, इस बार भी एक मुनाफ़िक़ हार का कारण बना। "मीर सादिक़" नाम के इस ग़द्दार ने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर उनकी जीत तय कर दी। इस मौक़े पर मशहूर शायर जौहर कानपुरी का शे'र एकदम सटीक बैठता है,
मेरी नाकामियों का दाग़ भी मंज़र से निकलेगा,
मुनाफ़िक़ जब मेरे हारे हुए लश्कर से निकलेगा।
हिंदुस्तान के दक्षिण से उत्तर भारत में मौजूद मुग़लिया सल्तनत और अवध की नवाबशाही अब अंग्रेज़ों के निशाने पर थी। उस्मानी ख़लीफ़ा जिस समय रूस से लड़ने में अपनी ताक़त लगा रहे थे, उस समय अंग्रेज़ हिंदुस्तान से उसकी ख़िलाफ़त को ख़त्म करने की योजना को शतरंज की चाल की तरह आगे बढ़ा रहे थे।
बाक़ी बातें इस दास्तान की अगली कड़ियों में जारी रहेगी। आपसे बस इतनी-सी गुज़ारिश है इस इतिहास को पढ़कर अंग्रेज़ क़ौम की चालों को समझते रहियेगा, तभी आप जान पाएंगे कि हमने इसके टाइटल में न्यू वर्ल्ड ऑर्डर शब्द का इस्तेमाल किस वजह से किया है?
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सलीम ख़िलजी
एडिटर इन चीफ़,
आदर्श मुस्लिम अख़बार व आदर्श मीडिया नेटवर्क
जोधपुर राजस्थान। व्हाट्सएप/टेलीग्राम : 9829346786
इस सीरीज़ के पूर्ववर्ती आर्टिकल्स :
■ न्यू वर्ल्ड ऑर्डर-01 : बंगाल में अंग्रेज़ सरकार
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