जिस योगी को मोदी-शाह लाए उसी चेहरे पर टकराव क्यों?
उत्तरप्रदेश की राजनीति को लेकर न्यूज़ चैनलों से लेकर प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया तक, सबके अपने-अपने आंकलन हैं। हमने यूपी के पिछले चुनाव से जो-कुछ संदेश समझा है, उसी के आधार पर यह विश्लेषण कर रहे हैं। इसमें आपको वो थ्योरी नज़र आएगी, जिस पर अभी तक किसी की नज़र नहीं गई है। आर्टिकल के अंत में हमने हवा में चल रही बातों की ज़मीनी हक़ीक़त भी बयान की है।
आगे बढ़ने से पहले हम यूपी की 2002 से 2017 सरकारों पर एक नज़र डाल लें।
राजनाथ सिंह (बीजेपी) : 28 अक्टूबर 2000 से 08 मार्च 2002 तक
राष्ट्रपति शासन : 56 दिन तक
मायावती (बसपा) : मई 2002 से अगस्त 2003 तक
मुलायम सिंह यादव (सपा) : अगस्त 2003 से मई 2007 तक
मायावती (बसपा) : 2007 से 2012 पूर्ण बहुमत की सरकार
अखिलेश यादव (सपा) : 2012 से मार्च 2017 पूर्ण बहुमत की सरकार
उत्तर प्रदेश, साल 2016, क़रीब-क़रीब सभी राजनीतिक विशेषज्ञ यह मान रहे थे कि अखिलेश यादव की सरकार 2017 में वापस नहीं आएगी। राजनीतिक रायशुमारियाँ अगली सरकार मायावती की बता रही थीं। बीजेपी उस वक़्त भी तीसरे नम्बर पर बनी हुई थी। इस बात की ताईद उस वक़्त की मीडिया रिपोर्ट्स भी कर रही थी। 17 मार्च 2016 की एक ख़बर और एक ओपिनियन पोल का स्क्रीनशॉट देखिये।
यही बात दिल्ली में मोदी सरकार की चिंता का सबब बनी हुई थी क्योंकि सवाल दो साल बाद होने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव का था।
उस समय बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद के दो बड़े दावेदार थे, केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा और इन दोनों के बीच तीसरा नाम लिया जा रहा था, पूर्व केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा का। मगर पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुछ और ही चल रहा था।
सोशल मीडिया पर बड़ी तेज़ी से कुछ वीडियो वायरल हो रहे थे। इन वीडियोज़ का फिल्मांकन भड़काऊ अंदाज़ में किया गया था। उनमें कई नारे थे, जिनमें से एक था, "राजतिलक की करो तैयारी, आ रहे हैं भगवाधारी।"
यह नारा बहुत ज़्यादा पॉपुलर हुआ। ये भगवाधारी कौन था, जिसके आने की बात इन नारों में कही जा रही थी? कौन था वो जिसने 15 साल से राजनीतिक वनवास झेल रही बीजेपी को तीसरे नम्बर से उठाकर प्रचंड बहुमत के साथ पहले नम्बर पर डाल दिया?
योगी आदित्यनाथ नामी इस भगवाधारी के बारे में किसी ने क़यास भी नहीं लगाया था कि वो यूपी के मुख्यमंत्री हो सकते हैं। तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष और वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह का यह वीडियो देखिये, जिसमें वो खुले शब्दों में कह रहे हैं कि सभी आपत्तियों को दरकिनार करके, प्रशासनिक अनुभव न होने के बावजूद कैसे उन्होंने मोदीजी की सहमति से योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया?
योगी सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में हार्डकोर हिंदुत्व के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया। मुसलमानों और मुस्लिम नेताओं को हाशिये पर डालने में कोई उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। समाजवादी पार्टी के कद्दावर मुस्लिम नेता आज़म ख़ान और बसपा के मुख़्तार अंसारी के राजनीतिक कैरियर को चौपट करने में उन्होंने पूरी ताक़त लगा दी। अब ऐसा क्या हो गया है कि योगी आदित्यनाथ, मोदीजी और शाहजी की गुड बुक से बाहर हो गये?
असल बात यह है कि उत्तर प्रदेश में जाति की राजनीति चलती है। हिंदुत्व का जो उफान 2017 में था, वो अब नहीं है। हालिया पंचायत चुनावों में बीजेपी की हार के बाद यही संदेश निकलकर आया है। ऐसा लग रहा है कि 2022 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में एक बार फिर जाति की राजनीति चलेगी और इस तरह की राजनीति में योगी आदित्यनाथ अनफिट है।
अब बात केंद्र सरकार की। 10 साल से जमी हुई कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को सत्ता से बेदखल करके मई 2014 में मोदी सरकार ने देश की सत्ता संभाली। पहली बार बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला।
बीजेपी ने 2014 में 283 सीटें जीती थीं, उनमें से 71 सीटें यूपी की थीं। आपको यह जानकार हैरानी होगी की बीजेपी उस वक़्त यानी 2014 में भी 2019 में वापसी की चिंता कर रही थी और आरएसएस ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी थी। 2019 में बीजेपी ने 303 सीटें जीतीं मगर यूपी की हिस्सेदारी घटकर 63 सीट हो गई।
बीजेपी को डर है कि अगर 2007 की तरह मायावती ने ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित (MBD) समीकरण सेट कर लिया या अखिलेश यादव ने यादव, ओबीसी, मुस्लिम (YOM) साधने में कामयाबी पा ली तो उत्तर प्रदेश हाथ से जाना तय है।
अगर 2022 में यूपी में बीजेपी की सरकार नहीं बनी तो 2024 में होने वाले आम चुनाव में बीजेपी की सीटें और कम हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो मोदी सरकार को तीसरा कार्यकाल मिलना मुश्किल हो जाएगा। इसी बात को लेकर मोदी-शाह जोड़ी चिंतित है लेकिन दिक़्क़त यह है कि जिसे उन्होंने यूपी की सत्ता पर बिठाया था, वो "योगी हठ" पर अड़ा हुआ है।
■ अब हवा में चल रही कुछ हवाई बातों की ज़मीनी हक़ीक़त भी जान लीजिये।
◆ योगी आदित्यनाथ की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी "दूर की कौड़ी" है। यूपी चलाने में और देश चलाने में बड़ा फ़र्क़ है, यह बात योगी आदित्यनाथ भी अच्छी तरह से जानते हैं और आरएसएस भी। एक रणनीति के तहत ऐसी बातें फैलाई जा रही है ताकि उन्हें यूपी से न हटाया जाए।
योगी सरकार की एंटी-इनकम्बेंसी को कंट्रोल करने के लिये कुछ काम किये गये हैं और कुछ काम किये जाएंगे। मुलाहिज़ा फरमाएं,
◆ जतिन प्रसाद दो साल से योगी सरकार को "ब्राह्मण विरोधी रुख़" के लिये घेर रहे थे। बीजेपी जॉइन करने के बाद वो अभियान बंद हो गया है। इससे ज़्यादा जतिन प्रसाद की कोई राजनीतिक ताक़त नहीं है।
◆ अरविंद कुमार शर्मा, भूमिहार जाति से हैं जिसका पूर्वी उत्तरप्रदेश में काफ़ी असर है। शर्मा के ज़रिए इस वर्ग को साधने की कोशिश की गई है।
◆ ओमप्रकाश राजभर के एनडीए छोड़ने और असदुद्दीन ओवैसी के साथ एलायंस बनाने के बाद उनकी भरपाई बसपा से किसी राजभर नेता को बीजेपी में लाकर की जाएगी। राजभर समाज का भी पूर्वांचल में काफ़ी बड़ा असर-रसूख है।
◆ 2017 के चुनाव में बीजेपी ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था। यूपी में मुस्लिम आबादी क़रीब 20% है। इस बार कुछ टिकट देकर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण में सेंध लगाने की कोशिश की जाएगी। ग़ौरतलब है यूपी में मसलकी मतभेदों को हवा देकर मुस्लिम ध्रुवीकरण को बिखेरना, बंगाल के मुक़ाबले में ज़्यादा आसान काम है।
मुस्लिम समाज के लोगों के लिये सबसे बेहतर यह है कि वो अपने समाज के कंप्लीट रिफॉर्म (सम्पूर्ण सुधार) पर ध्यान दे। सोशल मीडिया पर सियापा करने से यह ज़्यादा बेहतर है।
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सलीम ख़िलजी
एडिटर इन चीफ़, आदर्श मुस्लिम अख़बार व आदर्श मीडिया नेटवर्क
जोधपुर राजस्थान। व्हाट्सएप/टेलीग्राम : 9829346786
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