ये तो एक झांकी है, असली सियासत बाक़ी है
*(यह पोस्ट एक छुपे हुए सियासी मक़सद को एक्सपोज़ करने के लिये लिखी गई है। कृपया इसे पूरा पढ़े बिना कोई राय न बनाएं।)*
तब्लीग़ी जमाअत के निज़ामुद्दीन मर्कज़ का मामला बाज़ारवादी मीडिया ने गरमाया हुआ है और इसे तब तक गरमाए रखा जाएगा, जब तक इसके वांछित नतीजे उनके सियासी आक़ाओं को नहीं मिल जाते।
वैसे शुरुआती नतीजे सामने आने लगे हैं। नीचे लिखी बातों पर ग़ौर करें,
01. कोरोना संक्रमण के फैलने के दौरान मुस्लिम समाज में अल्लाह तआला के आगे अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने का जज़्बा पैदा हुआ। इसके अलावा आपसी इत्तिहाद की ख़बरें भी सामने आई थी। लेकिन एक बार फिर सोशल मीडिया पर तेरा मसलक-मेरा मसलक, इसका मसलक-उसका मसलक वाला खेल शुरू हो गया है।
02. उर्दू अख़बार इंक़लाब के 1 अप्रैल 2020 के फ्रंट पेज की हेडलाइन है, मर्कज़ के 24 लोगों में कोरोना की तस्दीक इसी के नीचे एक ख़बर की हेडलाइन है, अमीनाबाद की मर्कज़ मस्जिद सीज, छह ग़ैर-मुल्की आइसोलेशन के लिये भेजे। इस ख़बर का सब-टाइटल है, तब्लीग़ी जमाअत मामले की आँच लखनऊ पहुँची।
03. इसी अख़बार इंक़लाब के 1 अप्रैल 2020 के वाराणसी संस्करण के पेज नम्बर-8 पर एक और ख़बर छपी है, जिसमें कहा गया है, उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अलर्ट जारी करके तब्लीग़ी जमाअत के लोगों की जांच करने और उनको आइसोलेट करने की हिदायत जारी की।
04. अब ऐसा पूरे देश में किये जाने की तैयारियां है। मुसलमानों में ही कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं जो इसके लिये ज़मीन तैयार कर रहे हैं। राजस्थान में ऐसे कुछ लोग सक्रिय हो भी गये हैं।
05. इसी अख़बार के फ्रंट पेज पर चौथाई पन्ने का एक विज्ञापन छपा है। यह विज्ञापन सज्जादगान ख़ानक़ाहे बरकातिया, मारहरा शरीफ़ (यूपी) की ओर से जारी किया गया है। इस विज्ञापन में देश की सभी ख़ानक़ाहों के सज्जादानशीन हज़रात, पीराने-इज़ाम, मुफ्तियाने-इस्लाम व उलमा-ए-इस्लाम से अपील की गई है कि वो अपने मुरीदों से शफ़क़त भरी गुफ्तगू करके उनको तसल्ली दें। इसके अलावा इस विज्ञापन में सज्जादगान और पीराने-इज़ाम से यह भी गुज़ारिश की गई है कि वे अपने साहिबे-सरवत मुरीदों से राब्ता फ़रमाकर, मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने के लिये उभारें।
सबसे पहले हम यह स्पष्ट कर दें कि यह अपील बहुत अच्छी है। अन्य मसलकों की ओर से भी ऐसी अपीलें की गई हैं और लगातार की जाती रहनी चाहिये।
क्रोनोलॉजी समझने की कोशिश कीजिये
हमने इस पोस्ट का जो टाइटल लगाया है उसकी रोशनी में उम्मीद है अब आपके ज़हन में मुस्लिम समाज के साथ खेली जा रही सियासत की तस्वीर कुछ-कुछ साफ़ नज़र आने लगी होगी। ग़ौर करें,
० तब्लीग़ी जमाअत के उलमा और जमाअत से हमदर्दी रखने वाले लोग मर्कज़ निज़ामुद्दीन मामले की सफ़ाई देने के काम में लगा दिये गये हैं।
० बहुत से मुस्लिम इत्तिहाद पसंद लोग, जिनमें अहले-हदीस और बरेलवी मसलक से तअल्लुक़ रखने वाले भी शामिल हैं, मर्कज़ निज़ामुद्दीन के समर्थन में पोस्ट्स कर रहे हैं। उनको भी उसी ख़ेमे में शुमार किया जा रहा है।
० बड़ी सफ़ाई से सूफ़ी इस्लाम वर्सेज़ वहाबी इस्लाम की खाई को और चौड़ा करने की राजनीति का प्रयोग किया जा रहा है। कुछ दिन बाद जब कोरोना कंट्रोल में आ जाएगा तब यह कहा जाएगा कि दूसरे मसलक के लोग जब अपने मसलक को बचाने की जद्दोजहद में लगे थे, उस समय सूफ़ी हज़रात ख़ल्क़-ए-ख़ुदा को बचाने की कोशिश कर रहे थे।
० हो सकता है कि किसी को हमारे विचार *खाली क़यास (कोरी कल्पना)* लगें। हो सकता है कि कुछ लोग सहमत न हों लेकिन हमने एक पत्रकार-विचारक होने के नाते छुपी हुई राजनीति (Hidden Politics) को सामने लाने की कोशिश की है।
० हमारी राय है कि सभी मसलक के उलमा-ए-किराम और साहिबे-हैसियत हज़रात, ख़ानक़ाह बरकातिया की अपील को पॉज़िटिव रूप में लेते हुए, अपने घर, अपनी मस्जिद के आसपास और अपने मुहल्ले में रहने वाले लोगों के घर जाकर या फोन करके उनकी ख़बरगीरी करते रहें। उनको अल्लाह पर भरोसा रखने और सब्र करने की तलक़ीन करते रहें।
० साहिबे-हैसियत लोग न किसी का धर्म देखें और न किसी का मसलक देखें बल्कि हर इंसान को हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की औलाद मानते हुए उसके साथ बिना कोई दिखावा किये उनसे हमदर्दी जताएं।
० उनके लिये खाने व दीगर ज़रूरी चीज़ों का इंतज़ाम करें। ये बुरा वक़्त बीत जाएगा। भलाई करने वालों को उनकी नेकी का फल मिलेगा। देश में सद्भाव बना रहेगा और फूट डालकर राज करने वालों की शातिर सियासत नाकाम हो जाएगी।
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