वसीम रिज़वी की रिट की तकनीकी ख़ामियां

 
हमने अपने पिछले ब्लॉग क्या क़ुरआन में संशोधन किसी कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है? में काफ़ी विस्तार से कई बातें बताई थीं। आज के ब्लॉग में हम इस रिट की तकनीकी ख़ामियों के पहलू पर बात करेंगे।

01. क्या इसे जनहित याचिका माना जा सकता है?

जनहित याचिका के नाम पर वही रिट दायर की जा सकती है जिसमें आम जनता से जुड़ा कोई मसला हो। वादी वसीम रिज़वी और उसके वकील सुधाकर द्विवेदी के बयान सुनकर ऐसा नहीं लगता कि उन लोगों ने जनहित से जुड़ा कोई मुद्दा उठाया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद को बढ़ावा देने जैसे शब्दों की आड़ लेकर कोर्ट को गुमराह करने की साज़िश के अलावा इस रिट में और कुछ नहीं है। इसलिये इसे सुना ही नहीं जाना चाहिये।

02. भारत के मुस्लिम धार्मिक संस्थानों को रिट की कॉपी भेजकर जवाब मांगने का क्या कोई मतलब है?

रिज़वी के वकील सुधाकर द्विवेदी ने माना है कि कोर्ट यह कहकर रिट को ख़ारिज कर देता है कि वादी पहले Appropriate Places (उपयुक्त संस्थानों) में नहीं गया है। इससे बचने के लिये सभी मुस्लिम धार्मिक संस्थानों को रिट की कॉपी भेजकर जवाब माँगा गया।

यह दलील थोथी है क्योंकि जवाब माँगना ही था तो उन्हें इस रिट की कॉपी सऊदी अरब सरकार को भेजनी चाहिये थी, जहाँ से क़ुरआन पूरी दुनिया में फैला। जहाँ से दुनिया की हर भाषा में अनुवाद करके क़ुरआन को छापा और वितरित किया जाता है। पूरी दुनिया में जहाँ कहीं भी क़ुरआन छपता है उसका वेरिफिकेशन सऊदी अरब से छपे क़ुरआन की प्रति से किया जाता है।

इसलिये वसीम रिज़वी को चाहिये था कि वो इंटरनेशनल कोर्ट में सऊदी अरब सरकार पर मुक़द्दमा करते। इसमें भारत के सुप्रीम कोर्ट को बिला वजह घसीटकर भारत सरकार की छवि ख़राब का वसीम रिज़वी को क्या हक़ है?

इसलिये रिज़वी और उनके वकील सुधाकर द्विवेदी द्वारा दी गई भारतीय मुस्लिम धार्मिक संस्थानों से जवाब मांगने की दलील भी बिल्कुल बकवास है।

03. आरोप लगाने वाले के पास क्या सुबूत है कि क़ुरआन की यह 26 आयतें पहले तीन ख़लीफ़ा ने जोड़ी?

सारी दुनिया में न्याय का एक सर्वमान्य सिद्धांत है, वो यह कि आरोप साबित करने की ज़िम्मेदारी मुद्दई यानी वादी की है। वसीम रिज़वी ने इस्लाम के पहले तीन ख़लीफ़ा हज़रत अबूबक्र, हज़रत उमर, हज़रत उस्मान (रिज़वानुल्लाहि अज्मईन) पर क़ुरआन में 26 आयतें जोड़ने का जो इल्ज़ाम लगाया है, उसका सुबूत क्या है?

क्या वसीम रिज़वी की उम्र 1500 साल से ज़्यादा है? क्या उन्होंने इन तीनों ख़लीफ़ाओं का शासनकाल देखा है जो इतने कॉन्फिडेंस के साथ उन पर क़ुरआन में एडिटिंग करने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं?

असली बात : घोटालों से ध्यान हटाने का घृणित हथकंडा

◆ क़ुरआन में साफ़ लिखा है, धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। (सूरह बक़र: :256)

अगर वसीम रिज़वी को क़ुरआन पसंद नहीं है तो वो किसी अन्य धर्म में क्यों नहीं चले जाते? क्यों ज़बरदस्ती मुसलमान बने फिरते हैं?

हम आपको यह भी बता दें कि इसके ख़िलाफ़ शिया समुदाय की वक़्फ़ संपत्तियों का दुरुपयोग करने के इल्ज़ाम में सीबीआई जाँच चल रही है। इसके सुबूत के तौर पर हम, इस ब्लॉग के साथ एक ऑथेंटिक वीडियो भी पेश कर रहे हैं।

हम इस ब्लॉग के ज़रिए, देश के सभी मुसलमानों से अपील करते हैं कि एकदम अहिंसात्मक तरीक़े से वसीम रिज़वी के ख़िलाफ़ हर मुमकिन क़ानूनी कार्रवाई करें। मुस्लिम समाज का ग़ुस्सा जायज़ है लेकिन शांतिपूर्ण तरीक़े से इस आदमी की चालों को नाकाम भी करना है। इस ब्लॉग को शेयर करके शांति व सद्भाव क़ायम रखते हुए वसीम रिज़वी के प्रोपेगैंडा को नाकाम करें।
 
शुक्रिया वस्सलाम,
सलीम ख़िलजी
(चीफ़ एडिटर आदर्श मुस्लिम व आदर्श मीडिया नेटवर्क)
जोधपुर राजस्थान

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