नेहरुजी की ग़लती सुधार क्यों नहीं लेते?
जब भी चीन की बात चलती है बीजेपी से जुड़े तमाम नेता और उसका हर छोटा-बड़ा समर्थक नेहरूजी को कोसने लगता है। आज के ब्लॉग में हमने कुछ खरी-खरी बातें कहने की कोशिश की है। उम्मीद है नेहरु-कोसक समुदाय इस पर गंभीरता से विचार करेगा।
हाल ही में चीन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले छह सालों में किये गये तमाम आदर-सत्कारों को एक साइड रखकर लद्दाख की गलवान घाटी में घुसपैठ की। उसे रोकने के प्रयास में 20 जवानों ने अपनी जानें क़ुर्बान कर दीं। जब विपक्षी दल कांग्रेस ने इस पर हो-हल्ला मचाया तो सरकारी खैमे से वही घिसा-पिटा जवाब आया, ये सब नेहरूजी की ग़लती है, 1962 में उन्हीं के कार्यकाल में चीन ने जम्मू-कश्मीर के एक बड़े हिस्से, अक्साई चिन पर क़ब्ज़ा कर लिया था। सत्ताधारी खैमा बार-बार यह कहता है कि नेहरूजी ने चीन को शह न दी होती और उस पर अंधा भरोसा न किया होता तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता।
चलिये हम भी मान लेते हैं कि नेहरूजी ने चीन पर भरोसा करके ग़लती की लेकिन आपने वही ग़लती क्यों दोहराई?
◆ आपने शी जिनपिंग को गुजरात में झूला क्यों झुलाया?
◆ भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा यानी 18 बार चीन के राष्ट्रपति से मिलने का क्रेडिट भी आपके खाते में क्यों है?
◆ आपके राज में भी चीन से इतना ज़्यादा आयात क्यों है?
◆ आपके सत्ता में आने के बाद चीन के इन्वेस्टमेंट में बढ़ोतरी क्यों हुई?
◆ ये सब किसकी ग़लती है? क्या ये नेहरूजी का चीन से किया हुआ सरकारी कमिटमेंट है जिसे पूरा करना उनके बाद वाली हर सरकार की मजबूरी है?
जवाब दीजिये, देश जानना चाहता है। सच तो यह है कि जनता को न सिर्फ़ भरमाया जा रहा है, बल्कि राष्ट्रवाद के नारों की आड़ में अपनी नाकामियों को छुपाने के लिये उसको बरगलाया जा रहा है।
तू इधर-उधर की न बात कर,
ये बता कारवां क्यों लुटा?
मुझे रहज़नों से गिला नहीं,
तेरी रहबरी का सवाल है?
अब आइये नेहरूजी के दौर के भारत और मोदीजी के दौर के भारत की तुलना करके देखें।
1962 में भारत एक नव-स्वतंत्र देश था यानी अंग्रेज़ों से आज़ाद हुए मात्र 15 साल हुए थे। तब हमारी सेना के पास पर्याप्त हथियार नहीं थे क्योंकि हम उस मामले में विदेशों पर निर्भर थे। देश में ग़रीबी थी, जनता का पेट भरने लायक़ अनाज पैदा करने में देश सक्षम नहीं था। उस समय पाकिस्तान भी संयुक्त था यानी बांग्लादेश तब पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था। ऐसे दौर में पूर्वी-पश्चिमी सीमाओं की हिफ़ाज़त करते हुए उत्तर में चीन से जंग लड़नी पड़ी जो उस समय भी एक ताक़तवर देश था।
2014 में मोदीजी को विरासत में वो भारत मिला जो अपनी जनता का पेट भरने हेतु खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है। पाकिस्तान को 1965 में हराने के बाद 1971 में दो टुकड़ों में तोड़कर कमज़ोर किया जा चुका है। अब भारत के पास परमाणु बम है। लम्बी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें भारत ख़ुद बना चुका है। अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेजने में भारत सक्षम है। 1962 के मुकाबले में 2020 के भारत की बहुत ज़्यादा मज़बूत सेना है।
1962 में, जब नेहरूजी के शासन वाला भारत आज के मुक़ाबले में हर क्षेत्र में कमज़ोर था, उसके बावजूद उसने चीन का सामना किया और जंग लड़ी। 2020 का भारत हर क्षेत्र में समर्थ है, आज मोदीजी को यह सफाई देने की क्या ज़रुरत है कि चीन हमारी सीमा में एक इंच भी नहीं घुसा है? मोदीजी को तो चीन से यह कहना चाहिये था कि 1962 में क़ब्ज़ाई हुई ज़मीन वापस करो। अगर चीन आना-कानी करे तो फिर बल-प्रयोग करके नेहरूजी के दौर में हुई ग़लती को सुधार लिया जाए।
देश की जनता को चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की बात कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी अगर सरकार चीन से हर आयात पर रोक लगा दे। चीन के इन्वेस्टमेंट को ख़त्म किया जाये तो उसके पास भारत की किसी कम्पनी से जुड़ी जानकारी नहीं होगी।
सरहदों की हिफाज़त के लिये मोदीजी के साथ पूरा देश खड़ा है लेकिन सरकार के मुंह से ऐसी आवाज़ ही नहीं निकल रही। इसका मतलब क्या है? यही न कि देश को सिर्फ़ जज़्बातों में बहकर नहीं चलाया जा सकता। बहुत-सी चीज़ें देखनी पड़ती है। अगर यही बात है तो फिर उन्माद भी न पैदा किया जाये। अगर 1962 में छिनी हुई ज़मीन वापस छीनने की स्थिति इस समय नहीं है तो फिर बार-बार नेहरूजी को कोसना भी बंद किया जाये।
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