मुसलमानों की बदहाली की वजह क्या है?

यह ब्लॉग जनाब अब्दुल रशीद अंसारी ने लिखा है। इस लेख को पढ़ने से पहले बीजेपी लीडर सुधांशु द्विवेदी के इस दो मिनट के बयान को सुनिये, जो उन्होंने राज्यसभा में दिया था। यह ब्लॉग उस बयान पर विचार-विमर्श के तौर पर लिखा गया है।

बीजेपी नेता सुधांशु द्विवेदी ने जो कहा वो ये आधा सच है, इसका बाक़ी आधा सच इस तरह से है,

01. 1947 में विभाजन के साथ भारत को आज़ादी मिली। यह बंटवारा सावरकर के एक स्टेटमेंट, आजादी के बाद भारत एक हिन्दू राष्ट्र होगा, की वजह से हुआ जो कि एक सोची-समझी साज़िश के तहत था। लेकिन इसका इल्ज़ाम किन पर आया? मुसलमानों पर, जिनको टुकड़े करने के लिए ज़िम्मेदार ठहराकर हमेशा एक दबाव बनाया जा सके।

02. विभाजन के बाद क्रीमी लेयर मुसलमानों का 90% तबका पाकिस्तान चला गया। यहाँ जो मुसलमान रहे, उन पर एक सोची-समझी साजिश के तहत हमेशा यह इल्ज़ाम लगाया गया कि तुम गद्दार हो, पाकिस्तानी हो। ऐसा इसलिये किया गया ताकि उनमें अहसास-ए-कमतरी (हीनभावना) बनी रहे। जो 10% क्रीमी लेयर मुस्लिम थे उन्होंने जितना बन सका था इस प्रोपेगैंडा का अपोज भी किया लेकिन नतीजा सिफ़र रहा क्योंकि मामला पूरी तरह बिगड़ चुका था।

03. वक़्त बीतने के साथ, जैसे-तैसे इस इलज़ाम से कुछ राहत महसूस हुई तो दंगों के जरिए हमें बर्बाद करने का मिशन शुरू हो गया, जो आज तक जारी है। हाल ही में दिल्ली का दंगा ख़तम हुआ है।

04. इसके साथ ही एक और जुमला चल रहा था मुस्लिम तुष्टीकरण का जो बिलकुल बकवास था और कांग्रेस व उसमें मौजूद आरएसएस की काली भेड़ों के जरिए हमें बर्बाद करने के लिए इस्तेमाल किया गया।
कांग्रेस ने कभी भी मुस्लिम कयादत (लीडरशिप) को पनपने नहीं दिया।

05. हमारे तालीमी इदारों पर लगातार हमारे किये जाते रहे, जो आज भी जारी है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को छीनने की कोशिश लगातार की जाती है और जामिया मिल्लिया इस्लामिया पर अभी भी हमले जारी हैं। जिस क़ौम में तअलीम का मेअयार गिरता है वो क़ौमें तरक्की नहीं करतीं।

06. गैर-मुस्लिमों में हमारे लिए हमेशा डर का माहौल पैदा किया गया, कभी पेट्रो डालर के नाम पर, कभी ज्यादा बच्चों की पैदाइश के नाम पर और कभी गुजरात मॉडल के नाम पर आतंकवाद का हौव्वा दिखाकर। ऐसे कितने वाक़ये गिनाऊं? हर-एक हथकंडा काम में लिया गया ताकि हम अपने मआशरे की फलाह और बहबूदी के काम से दूर हो जाये और ये लोग, आज जो बोल रहे हैं, उसकी तैयारी 1925 से चल रही है।

06. जहाँ तक दूसरी माईनोरेटी (सिख, जैन,पारसी और बौद्धिस्ट) की मिसाल पेश की गई है, उन्होंने क्या ऐसी किसी मुसीबत को झेला है? एक बार सिर्फ एक बार 1984 में सिखों पर दंगे हुए थे और आज तक वो सिख कम्युनिटी गिन-गिनकर बदला ले रही है। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी ने इसे भुलाने के दो टर्म यानी दस साल तक डाॅ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद दिया। लेकिन अभी तक उन्होंने इनका पीछा नहीं छोड़ा है।

07. दूसरी तरफ हमारा ये हाल है कि 1947 में पश्चिमी बंगाल से लेकर पूरे मुल्क भारत में हजारों-हजार दंगों में लाखों मुसलमानों का कत्ले-आम हुआ और अरबों-खरबों रुपये के माल-जायदाद के नुकसान को हम आसानी से भूल जाते हैं। अनेक जांच कमेटियों की रिपोर्ट्स के बावजूद आज तक इसके पीछे असल में ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा नहीं हुई। इतनी सारी ज़्यादतियां किसी और के साथ हुई होती तो उन क़ौमों का अब तक नामो-निशान भी बाकी नहीं होता।

09. यहाँ एक बात और जोड़ना चाहता हूँ कि कुछ ना-अहल लोग हमारे अपने मआशरे में अच्छे और भलाईयों के काम करने वाले लोगों की जबरदस्त टांग खिंचाई करते रहते हैं जिससे तरक्की के रास्ते में रोड़े आना लाज़मी बात है।

कहीं दूर क्यों जाया जाये, अपने जोधपुर में ही देख लीजिये, जिन लोगों ने नेशनल लेवल की यूनिवर्सिटी क़ायम की है, उनकी किस तरह से टांग खिंचाई हो रही है और वो भी उन लोगों के जरिये, जो भलाईयों के काम कभी नहीं करते अपने आपको ज़हीन (बुद्धिजीवी) कहतें हैं। मुसलमानों की बदहाली एक वज़ह बल्कि सबसे बड़ी वज़ह ये भी रही है।

अब सवाल यह है कि इन हालात से पार पाने के लिए हमें क्या करना चाहिये? मेरी नज़र में कुछ काम हैं जिन पर ईमानदारी से, बिना लफ्फाजी के फोकस करके लगातार 15-20 साल तक किये जाएं तो हालात कारसाज हो सकतें हैं।

(01.) सबसे पहले और सबसे बड़ा मामला तअलीम का है उस पर फोकस हो।

(02.) किसी भी राजनीतिक पार्टी से कोई उम्मीद नहीं रखी जाए।

(03.) किसी एक पार्टी के अंधे वोटर नहीं बना जाये।

(04.) हमारा जो भाई राजनीति करता है, उसके साथ पूरी भीड़ बनकर, दबाव की राजनीति से अपने मसले सरकार तक पहुंचाने में साथ दिया जाये।

(05.) नरेंद्र मोदी और बीजेपी की बुराईयां करना बंद कर दिया जाए क्योंकि इसकी आड़ में बहुसंख्यक समुदाय को मुस्लिम समाज के ख़िलाफ़ लामबंद किया जाता है।

(06.) काम-धंधे और बिज़नेस पर ध्यान दिया जाये और इसमें अपने समाज के साथ-साथ उन लोगों को प्राथमिकता दी जाये जो मुस्लिम समाज के साथ हमदर्दी रखते हैं।

ये सब मेरी निजी राय है। मेरा मानना है कि हर समय बदहाली का रोना रोने के बजाय कुछ रचनात्मक काम किये जाने चाहिए।

Leave a comment.