इस्लामी समाज वर्सेज़ मौजूदा मुस्लिम समाज

इस्लामी समाज वर्सेज़ मौजूदा मुस्लिम समाज

हर क़िस्म की तारीफ़ अल्लाह के लिये है। आप सभी का शुक्रिया जो आदर्श मुस्लिम अख़बार की पोस्ट्स न सिर्फ़ पढ़ रहे हैं बल्कि अपनी राय भी पेश कर रहे हैं।

अलमिया (विडम्बना) यह है कि हम मुसलमान, दोहरे मापदंड के साथ जी रहे हैं। जब हम किसी के सामने, ख़ास तौर पर ग़ैर-मुस्लिमों के सामने बात करते हैं, तो इस्लामी समाज की खूबियां पेश करते हैं लेकिन हमारे परिवार व समाज में वो ख़ूबियाँ नज़र नहीं आती।

आइशा (अहमदाबाद) के ख़ुदकुशी केस के बाद दहेज के मुद्दे पर देश भर में बयानबाज़ी चल रही है। आज का ब्लॉग भी दहेज के मुद्दे पर कड़वी सच्चाई बयान करने के लिये लिखा गया है।

इस समय मुस्लिम समाज में दहेज के लेन-देन तीन तरीक़ों से होता है,

दहेज की पहली क़िस्म : दूल्हे के घरवाले, दुल्हन के बाप से अधिकारपूर्वक माँगते हैं। अच्छी क़िस्म की होटल या मैरिज प्लेस में शादी का फंक्शन करना है। बारात के स्वागत में खाने में फलाँ चीज़ पकानी है। दूल्हे को फलाँ मॉडल की गाड़ी या टू व्हीलर देना है। फलाँ-फलाँ सामान देना है और इतना रुपया कैश देना है। फिर तुर्रा यह कि साहब! मेहमानों के सामने आपकी ही इज़्ज़त बढ़ेगी। हमारा क्या है, अल्लाह का दिया हुआ सब-कुछ है हमारे पास। इस झूठी शान के लिये बेटी का बाप क़ुर्बान कर दिया जाता है।

दहेज की दूसरी क़िस्म : रिश्ता दिखाने वाला मीडिएटर लड़की के बाप को अच्छी पार्टी है, गँवाना मत की दलील देकर दूल्हे के परिवार के बिहाफ़ पर यह बता देता है कि लड़की के बाप को क्या-क्या देना है? शादी वाले दिन, दूल्हे का बाप अरे साहब! इतना सारा ताम-झाम क्यों किया? की मीठी झिड़की देते हुए अब आप इतनी मुहब्बत से दे रहे हैं तो लेना पड़ेगा कहते हुए सारा माल समेटकर चल पड़ते हैं।

तीसरी क़िस्म : लड़के का बाप, पहले से अनुमान लगा लेता है कि बेटी का बाप क्या-क्या चीज़ें देगा? लड़के के माँ-बाप दहेज के बारे में इतने कॉन्फिडेंट होते हैं कि बेटे के कमरे में रंग-रोगन तो करवा लेते हैं लेकिन बेड-बिस्तर नहीं बनवाते। इधर बेटी का बाप भी समझता है कि शादी में बेड-बिस्तर देना, टीवी-फ्रिज व दीगर घरेलू सामान देना, गाड़ी-टू व्हीलर देना उसका "फ़र्ज़" है और "बेटी-दामाद का हक़" है।

जब उम्मीद के मुताबिक़ माल-मताअ नहीं मिलता, तब लड़की के साथ तानेबाज़ी की शुरूआत होती है। तेरे बाप ने यह नहीं दिया, वो नहीं दिया। बेटी बाप के आगे दुखड़ा रोती है और बाप बेटी का घर बचाने के लिये मजबूरन दहेज डिमांड पूरी करने लगता है।

दहेज की यह तीसरी क़िस्म आम है। बड़े-बड़े दीनदार भी लेने में कोई ऐब नहीं समझते। लेकिन कभी-कभी इससे उलट मामला भी देखने को मिलता है कि अगर कोई दीनदार या नेक परिवार दहेज के सामान लेने से इंकार करे तो लड़की वाले इस बात के लिये तैयार नहीं होते कि ऐसे-कैसे ख़ाली हाथ लड़की को विदा कर दें?

ये है आज का मुस्लिम समाज। अब इस्लामी समाज को देख लें। क़ुरआन ने माल ख़र्च करने की शर्त के साथ मर्द को "क़व्वाम (सरताज)" करार दिया। हदीसों में ज़िक्र मिलता है कि मेहर की अदायगी के बिना मर्द शादी ही नहीं कर सकता था।

जिस दहेजे-फ़ातमी की लोग मिसाल देते हैं, उनको याद रखना चाहिये कि हज़रत अली (रज़ि.) की जिरह बख़्तर (कवच) को बेचकर सय्यदा फ़ातिमा (रज़ि.) का मेहर अदा किया गया था। इसी मेहर की रक़म में से चमड़े का गद्दा, तकिया, चक्की, दो घड़े दिये गये थे।

और एक बात याद रखिये, अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपनी चारों बेटियों के रिश्ते की बात पक्की करते वक़्त कोई हुजूम जमा नहीं किया था। किसी भी बेटी की निकाह के बाद कोई दावत का इंतज़ाम नहीं किया था और न ही कोई बारात आई थी। यहाँ तक कि सहाबा-ए-किराम की शादियों में भी बारात का कोई सुबूत नहीं मिलता।

इस्लामी समाज में शादी का सारा ख़र्च मर्द के ज़िम्मे रखा गया है। लेकिन मौजूदा मुस्लिम समाज को तलाक़ के टाइम तो शरीअत याद आती है लेकिन निकाह के वक़्त वो शरीअत भूल जाता है।

आख़री बात, उन सभी सवालों का जवाब है जो कही जाती है, कहना आसान है, अपने घर में सब लोग शरीअत को भूल जाते हैं। अल्हम्दुलिल्लाह! साल 2015 में हमने अपनी बेटी की शादी मस्जिद में की। अल्लाह को गवाह बनाकर विरासत में हिस्सा देने के वादे के साथ की। ख़ालिस सुन्नत तरीक़े से बिना दहेज, बिना दावत के, की। अल्हम्दुलिल्लाह! अल्लाह ने दो क़ाबिल बेटे दिये हैं। इन् शा अल्लाह उनकी शादी भी इस्लामी तरीक़े से करेंगे। इससे ज़्यादा हम कुछ और नहीं कह सकते।

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सलीम ख़िलजी
(चीफ़ एडिटर आदर्श मुस्लिम व आदर्श मीडिया नेटवर्क)
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Comments (9)
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