आइशा की ख़ुदकुशी क्या संदेश देती है?
अहमदाबाद (गुजरात) की एक मुस्लिम लड़की आइशा की शादी जालोर (राजस्थान) के एक लड़के आरिफ़ से हुई। लड़की ने साबरमती नदी में कूदकर ख़ुदकुशी कर ली। साबरमती की लहरों में समा जाने से पहले उसने एक वीडियो बनाया। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
इस वीडियो को देखने के बाद निम्नलिखित बातें पता चलती है,
01. आइशा, अपने पति आरिफ़ से प्यार करती थी। वो उसके साथ जीना चाहती थी मगर आरिफ़ उससे अलग होना चाहता था।
02. आइशा के वालिद ने आरिफ़ के ख़िलाफ़ दहेज प्रताड़ना का मुक़द्दमा किया था। आइशा इस बात से ख़ुश नहीं थी। उसने मरने से पहले बनाए गये वीडियो में भी अपने पिता से केस विड्रॉल करने की बात कही।
03. आइशा और आरिफ़ की शादीशुदा ज़िंदगी में बहुत ज़्यादा तल्ख़ी आ चुकी थी। उसकी वजह क्या थी, इसकी पूरी जानकारी सामने आना बाक़ी है।
अब सवाल यह है कि क्या इस अप्रिय परिस्थिति को टाला जा सकता था?
जी हाँ! मगर अफ़सोस, हमारे समाज में पारिवारिक विवादों के समाधान के लिये दारुल क़ज़ा और काउंसिलिंग सेंटर नहीं है। इस ब्लॉग में आगे लिखे जा रहे अल्फाज़ किसी को सख़्त लग सकते हैं, मैं उसके लिये एडवांस में माफ़ी का तलबगार हूँ।
■ मुस्लिम समाज में, हर शहर में, एक-एक दारुल क़ज़ा क़ायम किये जाने की ज़रूरत है।
◆ इस्लामी शरीअत में दारुल क़ज़ा के प्रमुख को क़ाज़ी कहते हैं। उसका काम होता है, शरीअत की रोशनी में विवादों का समाधान करना। मुस्लिम समाज में क़ाज़ी तो बहुत हैं मगर उनका काम सिर्फ़ निकाह पढ़वाना है, कज़िया चुकाना नहीं। नतीजतन लोग पारिवारिक झगड़ों के निपटान के लिये कोर्ट में जाते हैं, जहाँ अक्सर मामले और बिगड़ जाते हैं।
■ निकाह के गवाह, विवादों के समाधान में अपनी ड्यूटी निभाएं।
◆ शादी में दूल्हे का बाप, अपने साथ एक जुलूस लेकर जाता है, जिसे बारात कहते हैं। लड़की का बाप, इन भूखे बारातियों को खाना खिलाता है लेकिन यही लोग "नमक हराम" साबित होते हैं।
किसी को यह पैराग्राफ नागवार लगे तो माज़रत चाहता हूँ लेकिन सच्चाई यही है कि दुल्हन के घर खाना खाकर आने वाले, उसकी शादीशुदा ज़िंदगी में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिये कभी आगे नहीं आते। इसलिये इस मौक़े पर बारात नामी फ़ालतू भीड़ न ले जाई जाए।
■ तलाक़ को ऐब न समझा जाए। लड़की की दूसरी शादी के लिये समाज आगे आए।
■ क़ौमी पंचायतें "पेरेलल कोर्ट" नहीं काउंसिलिंग सेंटर बनें।
◆ कुछ बिरादरियों में जाति पंचायतें होती हैं, जिन्हें खाप भी कहा जाता है। अक्सर पंचायतें इंसाफ़ नहीं करती। उनमें गुटबाज़ी होती है। जाहिलाना क़ानून चलते हैं। जो उनके क़ानून न माने उन्हें न्यात (बिरादरी) बाहर किया जाता है, फिर न्यात में शामिल करने के लिये दंड (जुर्माना) वसूली की जाती है।
1998 में इनके ख़िलाफ़ राजस्थान हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका लगी। 1999 में फ़ैसला आया, कोर्ट ने राजस्थान सरकार को क़ानून बनाने का आदेश दिया। 2001 में विधानसभा ने क़ानून बनाया। राजस्थान में ऐसी पंचायतों पर अब प्रतिबंध है। लेकिन अगर ये सामाजिक संस्थाएं काउंसिलिंग सेंटर के रूप में काम करे और लोगों के बीच सुलह कराने की कोशिश करे तो कोई पाबंदी नहीं है।
मुस्लिम समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो दुनिया में निज़ामे-मुस्तफ़ा लाने की सिर्फ़ बातें करते हैं। लेकिन वही लोग अपने घर में इस्लामी व्यवस्था लागू नहीं कर पाते। कुछ लोग सोशल मीडिया पर क्रांतिकारी पोस्ट लिखते हैं। लेकिन दहेज देने और लेने में कोई गुरेज नहीं करते। कई लोग अपनी बेटी को विरासत नहीं देते हैं और समझते हैं कि दहेज दे दिया, मायरा दे दिया, हिसाब साफ़ हो गया।
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सलीम ख़िलजी
(चीफ़ एडिटर आदर्श मुस्लिम व आदर्श मीडिया नेटवर्क)
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