आइशा के पति आरिफ़ को अधिकतम क्या सज़ा मिल सकती है?

आइशा ख़ुदकुशी केस के मामले में अहमदाबाद की रिवरफ्रंट थाना पुलिस ने उसके पति आरिफ़ खान को गिरफ़्तार किया था। कोर्ट से मिली तीन दिन की रिमांड अवधि आज 6 मार्च 2021 को पूरी हो गई और आरिफ़ खान को जेल भेज दिया गया।
इसी के साथ यह सवाल कई लोगों के मन में है कि भारतीय क़ानून के तहत आरिफ़ खान को अधिकतम कितनी सज़ा मिल सकती है?
रिमांड के दौरान पुलिस ने आरिफ़ खान को वो 70 मिनट की वो कॉल रिकॉर्डिंग सुनाई जो मरने से पहले आइशा ने आरिफ़ से की थी। पुलिस के मुताबिक़ आरिफ़ ने यह क़ुबूल किया कि वो आवाज़ उसकी है और उसने आइशा को मरने और मरने से पहले वीडियो बनाकर भेजने के लिये कहा था।
आइशा के परिवार की तरफ़ से एक ख़त भी कोर्ट में पेश किया जो आइशा ने मरने से पहले आरिफ़ को लिखा था। इस ख़त में आइशा ने अपने पति आरिफ़ पर कुछ इल्ज़ाम लगाए हैं और आरिफ़ के शक के जवाब में अपनी बेगुनाही की सफाई भी दी है।
क़ानून के जानकार बताते हैं अगर इन तथ्यों को कोर्ट मान लेता है तो आरिफ़ धारा 306 (आत्महत्या के लिये उकसाना) के तहत उसे अधिकतम 10 साल जेल की सज़ा हो सकती है। आरिफ़ के वकील की दलीलों से अगर कोर्ट संतुष्ट हो जाए तो 3 से 6 महीने के बाद आरिफ़ को ज़मानत मिल सकती है। अगर आरिफ़ कोर्ट में इन इल्ज़ामों से मानने से इंकार कर दे और पुलिस यह साबित न कर पाए कि कॉल रिकॉर्डिंग वाली आवाज़ वाक़ई आरिफ़ खान की है तो उस सूरत में आरिफ़ बरी हो जाएगा। यह है आइशा ख़ुदकुशी केस का क़ानूनी पहलू। आरिफ़ को न तो फाँसी होनी है और न ही उम्रक़ैद की सज़ा होनी है।
आइशा ने मरकर क्या पा लिया? कुछ नहीं! आरिफ़ की ज़मानत के बाद क्या फिर किसी और लड़की को इस तरह मरने के लिये उकसाने वाली वारदातें बंद हो जाएंगी? हरगिज़ नहीं! तो फिर इसका हल क्या है?
घर-परिवार भरोसे और मुहब्बत से चलता है। जब ये दोनों ही चीज़ें न रहे तो फिर ज़िंदगी कैसे चलेगी? मुस्लिम समाज में इस समय जो अराजकता की स्थिति है उसे ख़त्म करने के लिये कुछ कारगर इलाज की ज़रूरत है।
■ लड़कियां अपना भला-बुरा नहीं समझती इसलिये उनकी शादी से पहले लड़के वाले के परिवार की पूरी तहक़ीक़ात की जाए।
■ लड़की के स्वभाव से सबसे ज़्यादा माँ-बाप वाकिफ़ होते हैं। बेटी के स्वभाव के साथ निभाव कर सकने वाला दामाद तलाशा जाए। इसके लिये लड़के से बात करके परख भी कर लेनी चाहिये।
■ दहेज चाहनेवाले परिवार में बेटी की शादी करने के बजाय किसी सीधे-सादे परिवार में बेटी का रिश्ता किया जाए, भले वो गरीब हो।
■ हर शहर में काउंसिलिंग सेंटर्स क़ायम किये जाएं जहाँ मियां-बीवी में मनमुटाव होने पर उनको सही सलाह मिल सके।
इस पोस्ट को ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करके लोगों तक पहुंचाएं। यह किसी एक आदमी से पूरा हो जाने वाला काम नहीं है। समाज सुधार की सोच रखने वाले लोग जब आपसी संपर्क में आएंगे तब ही कोई कारगर रास्ता निकलेगा।
सलीम ख़िलजी
(चीफ़ एडिटर आदर्श मुस्लिम अख़बार व आदर्श मीडिया नेटवर्क)
जोधपुर राजस्थान। संपर्क के लिये व्हाट्सएप न. 9829346786
Leave a comment.