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ये मसला मध्यस्थता से सुलझ जाये तो अच्छा

  • Sat, 16 Mar 2019
  • National
  • Saleem Khilji

अयोध्या विवाद के समाधान के लिये पाँच जजों की बेंच बनी. उसने कहा, "ये केवल ज़मीन के मालिकाना हक का मामला नहीं है बल्कि दिलों से और लोगों की आस्था से जुड़ा है. यह एक संवेदनशील मामला है." सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर विवाद सुलझाने की एक फीसदी भी संभावना हो तो सभी पक्षों को मध्यस्थता के लिए जाना चाहिए. यह कहते हुए अयोध्या विवाद की सुनवाई के लिये बनी सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मध्यस्थता पैनल गठित कर दिया.

एक लम्बे इंतज़ार के बाद, फरवरी 2019 में अयोध्या के बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि मंदिर विवाद की सुनवाई के लिये कोर्ट बैठी। कोर्ट ने कहा, "आज से पहले क्या हुआ, मुगल शासक बाबर ने क्या किया या फिर उसके बाद क्या हुआ? इससे कोर्ट का कोई सरोकार नहीं है। हम इस मामले को वस्तुस्थिति के आधार पर ही देख सकते हैं।"

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में बनी बेंच के चार अन्य सदस्य हैं, जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नज़ीर।

इस बेंच ने मध्यस्थता के ज़रिए मामले को सुलझाने की कोशिश करने के लिये जिस "ऑर्बिटरी पैनल" का गठन किया है उसमें तीन लोग हैं; सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस फकीर मुहम्मद इब्राहीम खलीफुल्लाह (जो कि इस पैनल के अध्यक्ष भी हैं), आध्यात्मिक गुरू श्री श्रीरविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू। दिलचस्प बात ये है कि उत्तर प्रदेश के विवादित अयोध्या मामले को मध्यस्थता के ज़रिए सुलझाने की कोशिश करने वाले से तीनों लोग दक्षिण भारत से ताल्लुक़ रखते हैं।

इस मध्यस्थता पैनल को आठ सप्ताह का समय दिया गया है। इस मुद्दत में इन्हें विवादित मामले से जुड़े सभी लोगों से मिलकर एक "सर्वमान्य समाधान" का मसौदा तैयार करने की कोशिश करनी है। हर शांतिप्रिय भारतीय की तरह हमारी भी यही ख्वाहिश है कि विवादों भरी इस रात की कोई सुबह हो; इसीलिये हमने अपनी "कवर स्टोरी" का टाइटल "ये मसला मध्यस्थता से सुलझ जाए तो अच्छा" रखा है।

इस विवाद के बारे में विस्तार के साथ काफी जानकारियाँ "आदर्श मुस्लिम" के पिछले अँकों में छाप चुके हैं, जिनके ज़रिए इस विवाद की गहराई को समझा जा सकता है। आज हम आपके सामने इस विवाद के समाधान की चर्चा करते हुए कुछ "अनसुनी" मगर सच्ची बातें आपके सामने पेश कर रहे हैं।

अध्यादेश नहीं लाना चाहिये

प्रयागराज कुंभके दौरान विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित "धर्म संसद" के समापन सत्र में 1 फरवरी 2019 को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था, "वकील और मजिस्ट्रेट भी ऐसे मुझे मिले। रामजन्मभूमि के लिये लड़ने वाले वकील हैं; उनका ये मत है कि ये नहीं करना चाहिये।'

अगर सरकार अदालत का फैसला आने से पहले अध्यादेश लाकर विवादित ज़मीन हिन्दू पक्ष को सौंप देती तो इससे भारत की न्यायिक व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास उठ जाता और देश में एक अराजकता का माहौल पैदा हो जाता। इसी की तरफ आरएसएस प्रमुख ने कानूनी राय के ज़रिए इशारा किया।

अगर आसपास की ज़मीन मंदिर ट्रस्ट को दे देते तो?

जनवरी 2019 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्ज़ी दाखिल करके विवादित ज़मीन के पास वाली 65 एकड़ ज़मीन मंदिर ट्रस्ट को देने की मंशा जताई थी। अगर ऐसा होता तो क्या होता, इसका इशारा भी हमें संघ प्रमुख मोहन भागवत के धर्म-संसद में दिये गये उसी भाषण में मिलता है।

मोहन भागवत ने कहा था, "सब जानते हैं कि ज़मीन वापस हुई तो पहला काम क्या होगा? महाद्वार से आरम्भ करके गर्भगृह की ओर चलना, ये होना ही है।"

हम आपको बता दें कि विहिप ने राम मंदिर का जो नक्शा बनाया है उसके मुताबिक गर्भगृह उसी जगह पर बनेगा जहाँ 6 दिसम्बर 1992 की सुबह तक बाबरी मस्जिद मौजूद थी। मोहन भागवत के भाषण में साफ इशारा मौजूद है कि अविवादित ज़मीन पर मुख्‌यद्वार बनाने के बाद अंदर कौन घुसेगा? उसके बाद मंदिर निर्माण समिति जो चाहेगी, वहाँ मौजूद लोग वही करेंगे। मतलब यह कि जिस तरह भीड़ को उकसाकर 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को मिस्मार किया था, उसी तरह "ताकत के ज़ोर पर" मंदिर का निर्माण।

संघ प्रमुख ने जो-कुछ कहा उसमें कोई बात ढंकी-छुपी नहीं रही। उन्होंने संदेश दे दिया कि जब ताकत के ज़ोर पर बाबरी मस्जिद शहीद की गई तो कुछ दिन मुसलमानों में गुस्सा रहा। देश के कुछ शहरों में दंगे हुए, उसके बाद सब "शांत" हो गये। अस्थायी टेंट में ही सही लेकिन विहिप ने मंदिर बना लिया। अब बस क़ब्ज़ाशुदा ज़मीन का पट्टा बनवाना बाकी है। यही सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है क्योंकि कोर्ट से मन-मुताबिक फैसला करवाना आसान नहीं है।

ऑर्बिटरी पैनल में शामिल मेम्बरों का परिचय

जस्टिस फकीर मुहम्मद इब्राहीम खलीफुल्लाह ने अपना करियर अगस्त 1975 से बतौर वकील शुरू किया था। साल 2000 में उन्हें मद्रास हाईकोर्ट का स्थायी जज नियुक्त किया गया। 2011 में उन्हें जम्मू-कश्मीर का कार्यकारी चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया और इसके बाद उन्हें दो अप्रैल 2012 को सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस नियुक्त किया गया। 2016 में वह सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए।

श्रीराम पंचू एक वरिष्ठ वकील और जाने-माने मध्यस्थ हैं। वो "द मीडिएशन चैंबर्स" के संस्थापक भी हैं जो कि विवादों का निबटारा मध्यस्थता करती है। उन्होंने 2005 में भारत का पहला ऐसा मध्यस्थता केंद्र बनाया जो अदालत से सम्बद्ध था। श्रीराम पंचू ने भारतीय कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों में मध्यस्थ की भूमिका बखूबी निभाई है।

श्री श्रीरविशंकर हिंदू धर्म के एक आध्यात्मिक धर्मगुरू हैं और "आर्ट ऑफ लिविंग" के संस्थापक हैं। वे अयोध्या में राम मंदिर बनाने के पैरोकार हैं और एक साल पहले दिया गया उनका इंटरव्यू काफी चर्चा में रहा था।
श्रीश्रीरविशंकर ने कहा था कि कोर्ट के फैसले से इस मसले का समाधान नहीं होगा। जो भी पक्ष हारेगा वो यही समझेगा कि उसके साथ नाइंसाफी हुई है। उनका मानना है कि आपसी बातचीत के ज़रिए इस विवाद का हल निकाला जाना चाहिये। श्रीश्री का मानना है कि समझौते के अलावा किसी और तरीके से मंदिर के लिये विवादित ज़मीन दे दी गई तो 50-100 बाद भी मुस्लिम युवा इस बात को भूलेंगे नहीं; वे मस्जिद की ज़मीन वापस पाने के लिये उठ खड़े होंगे और विवाद ज्यों-का-त्यौं बना रहेगा। लेकिन इसके साथ ही श्रीश्री यह भी कहते हैं कि मुसलमानों को विवादित स्थान पर से अपना दावा छोड़कर किसी दूसरी जगह पर मस्जिद बना लेनी चाहिये।

काँटों का ताज

ऑर्बिटरी पैनल का अध्यक्ष बनाकर जस्टिस खलीफुल्लाह के सर पर काँटों का ताज रख दिया गया है। अगर वो मस्जिद बनाने के पक्ष को मज़बूत मान लेते हैं तो उन पर अपने समुदाय की ओर झुकने का आरोप लगेगा। निगाहें अब श्रीश्रीरविशंकर और श्रीराम पंचू के रवैये पर टिकी होंगी। श्रीश्री पहले भी मंदिर निर्माण की तरफदारी कर चुके हैं, अब वो अपने पुराने रुख से पलटेंगे, ऐसी सम्भावना कम ही है।

बहरहाल हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं कि मध्यस्थता पैनल कोई ऐसा रास्ता सुझाएगा जिसमें कोई पक्ष खुद को "हारा हुआ" महसूस नहीं करेगा।

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