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मुस्लिम समाज का उत्थान कैसे हो?

  • Fri, 01 Mar 2019
  • National
  • Saleem Khilji

दोस्तों! इस लेख के माध्यम से, आज हम एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण विषय पर अपने विचार आपके सामने बयान कर रहे हैं. यह बात सभी जानते हैं कि मुस्लिम समाज की वर्तमान हालत क्या है? हर किसी के मुँह से यही सुनने को मिलेगा कि मुस्लिम समाज की हालत, दलितों से भी गई-गुज़री है. ठीक है! यह बात सच है!! लेकिन क्या कभी हमने इसकी वजहों के बारे में सोचा? क्या हमने यह सोचा कि मुस्लिम समाज के उत्थान के लिये क्या किया जाना चाहिये और इसके लिये हम क्या-कुछ कर सकते हैं? यकीन मानिये सही सोच के बिना हर बात अधूरी ही रहेगी.

आइये हम सबसे पहले मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन की वजहों पर एक सरसरी नज़र डालें।


2 वजहें, पिछड़ेपन की

01. सरकार से असंतुष्ट रहना

सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, कुछ अपवादों को छोड़कर, हमने सरकारों को समाज-हित में काम करने के लिये प्रेरित करने का हुनर कभी काम में नहीं लिया। जो समाज खुद अपनी समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के प्रति जागरूक न हो, उसकी मदद तो अल्‌लाह भी नहीं करता। हमने अपनी खामी की ओर देखने के बजाय यही रोना रोया कि सरकार कुछ नहीं करती। जब सरकारें सेक्युलर पार्टियों की थीं तो हम सोचते थे कि मुस्लिम समाज के उत्थान का हर काम सरकार को करना चाहिये। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और न कभी हो सकता है। जब सरकार उन पार्टियों की बनी, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे "नॉन-सेक्युलर" हैं, तो हमने खुद ही यह फैसला कर लिया कि ये लोग हमारे लिये कुछ नहीं करेंगे।

"सदा-असंतुष्ट" रहने की ये नीति मुस्लिम समाज की तरक्की में सबसे बड़ी रूकावट है, इस सच्चाई को हमें मानना चाहिये।

02. अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर भागना

अगर हम अपने समाज के पिछड़ेपन के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण करें तो हमें महसूस होगा कि बहुत से काम हम खुद, अपने स्तर पर करके इस अभिशाप को दूर करने में दो कदम आगे बढ़ा सकते थे। लेकिन अफसोस! आम तौर पर हम ऐसा नहीं करते। हमने अपनी हालत यह बना ली है कि अगर हमारी गली में एक छोटा-सा गड्ढा भी है तो उसे भरने की कोशिश हम नहीं करते, हम सोचते हैं कि यह काम सरकार का है। एक तरफ हम यह रोना रोते हैं कि हमारे पास बच्चों को आ'ला ता'लीम दिलाने के लिये पैसे नहीं हैं, दूसरी तरफ उन्हीं बच्चों की शादी "रईसी ठाठ" से करने के लिये हम कोई समझौता नहीं करते हैं। क्या हम शादी को "सादी" करके उस रकम को अपने समाज के शैक्षणिक उत्थान में खर्च नहीं कर सकते? कर सकते हैं अगर हम, "दुनिया क्या कहेगी" वाली सोच छोड़ दें।

ये एक छोटी-सी मिषाल है, और भी कई काम ऐसे हैं जिनको हम अपने ता'लीमी, कारोबारी और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने से ज़्यादा अहमियत देते हैं। हो सकता है कि ये दोनों फेक्टर कुछ जगह लागू नहीं हो। मुझे पूरा यकीन है कि जहाँ ऐसा नहीं है वहाँ मुसलमानों की हालत पूरी तरह बेहतर भले ही न हो लेकिन बदतर भी नहीं है।

मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन के बारे में सरसरी तौर पर जाइज़ा लेने के बाद आइये हम इस समाज के उत्थान के लिये कुछ ज़रूरी कामों पर चर्चा करें।

2 काम, सरकार करे

01. वक्फ़ जायदादों का विकास

मुस्लिम समाज ता'लीमी, कारोबारी और सामाजिक रूप से इतना पीछे हो चुका है कि इसके उत्थान के लिये हज़ारों करोड़ रुपये के फण्ड की ज़रूरत है। हम इस सच्चाई से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि कोई भी सरकार इतनी बड़ी रकम खर्च नहीं कर सकती। एक सच्चाई यह भी है कि नाममात्र की सहायता राशि से भी समाज का भला नहीं होगा। लेकिन मायूसी की कोई बात भी नहीं है, मुस्लिम समाज के पास अरबों रुपये की वक्फ़ जायदादें हैं। सरकार को चाहिये कि इन जायदादों को विकसित करने में मदद करे। इस काम में बहुत थोड़ी-सी रकम खर्च होगी लेकिन उसके बाद एक बहुत बड़ी आमदनी नियमित रूप से हासिल होने लगेगी। इस रकम का इस्तेमाल मुस्लिम समाज के शैक्षणिक स्तर को सुधारने में किया जाए तो बहुत अच्छे नतीजे सामने आ सकते हैं।

वक्फ़ जायदादों के विकास से हुई ता'लीमी तरक्की की एक जीती-जागती मिसाल जोधपुर हैं जहाँ दो सीनियर सैकण्डरी स्कूल, बीएड, नर्सिंग, फार्मेसी कॉलेज और एक यूनिवर्सिटी भी चलाई जा रही है।

02. नौकरी और कारोबार के लिये सहायता करे

सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है और इसे बढ़ाए जाने की ज़रूरत है। ऐसा किये जाने से देश की छवि भी निखरेगी कि भारत ने अपने मुस्लिम नागरिकों को सम्मानपूर्ण अधिकार दिया है। मुस्लिम समाज में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्हें अगर कम ब्याज दर पर या बिना ब्याज पर वित्तीय सहायता दी जाए तो वे अच्छे कारोबारी बनकर देश की आर्थिक प्रगति में सहयोगी षाबित हो सकते हैं। इसके साथ ही सरकार को चाहिये कि वो बैंकों की उस अघोषित नीति पर भी अंकुश लगाए, जिसके तहत उन्होंने मुस्लिम बहुल इलाकों को "ब्लैक लिस्टेड एरिया" बताते हुए ऋण देने पर रोक लगा रखी है। यह भी देखा गया है कि अगर कोई छोटा कारोबारी पूरा क़र्ज़ चुका दे और 2-4 हज़ार रुपये का ब्याज बाकी रह जाए तो बैंक उसे फोन कर-करके परेशान कर देते हैं।

ये दोनों काम ज़्यादा मुश्किल नहीं है। मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों को चाहिये कि इस दिशा में सरकार को प्रेरित करने के लिये ठोस कार्ययोजना बनाकर काम करें।

2 काम, मुस्लिम करे

01. हर सरकार का सहयोग करना और लेना

मुस्लिम समाज को "सदा-असंतुष्ट" रहने की नीति छोड़नी चाहिये। समाज को तरक्की के लिये किन-किन चीज़ों की ज़रूरत है, उसके बारे में ठोस और स्पष्ट कार्ययोजना बनाकर सरकार के सामने पेश करनी चाहिये। अपने हक को पाने के लिये लोकतांत्रिक रूप से जो कदम उठाए जा सकते हों, उन्हें उठाना चाहिये। सरकार किसी भी पार्टी की हो, हमें हमेशा अपने समाज का हित सामने रखते हुए उनसे सम्पर्क रखना चाहिये।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी विशेष राजनीतिक दल को "अछूत" का दर्जा देना समाज-हित में नहीं होता है, यह बात हमेशा याद रखनी चाहिये।

02. समर्थ मुस्लिम अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाए

ऐसा नहीं है कि पूरा का पूरा मुस्लिम समाज आर्थिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है। इस समाज में बहुत सारे आ'ला ता'लीमयाफ्‌ता (उच्च शिक्षित) लोग हैं; उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे अपनी सेवाएं देकर समाज के शैक्षणिक विकास के लिये काम करें। यह भी देखा गया है कि कई रिटायर्ड मुस्लिम शिक्षाविद्‌ भी बिना तनख्वाह, समाजसेवा के लिये तैयार नहीं होते हैं।

इसी तरह मुस्लिम समाज में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनके बिजनस का टर्नओवर लाखों-करोड़ों रुपयों में हैं। ऐसे लोगों को चाहिये कि अपना सामाजिक दायित्व निभाते हुए मुस्लिम समाज के शिक्षण संस्थानों की ज़रूरतों का पता लगाकर उनकी यथासम्भव मदद करें। कोई मदद माँगने आएगा तो करेंगे वाली सोच को बदला जाना चाहिये, यह समाज-हित में बेहद ज़रूरी है। हम मुस्लिम, हर साल एक बहुत बड़ी रकम ज़कात के रूप में अदा करते हैं। अगर इस रकम का सही और संगठित तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो बेहतरीन नतीजे सामने आ सकते हैं।

एक कहावत है, "जब कोई सच्चे दिल से अच्छे काम की शुरूआत करता है तो कायनात की हर चीज़ उसकी मदद करती है।"

एक बात हमें यानी मुस्लिम समाज को हमेशा याद रखनी चाहिये कि अल्लाह तआला हर परिंदे को दाना-पानी देता है, लेकिन दाना-पानी तलाश करना परिंदे की ज़िम्मेदारी है।

2 कदम, मिलकर चलें

01. हमारा भारत दंगा-मुक्त राष्ट्र­ बने

हमने दंगों की वजह से क्या-कुछ गंवाया है, इस पर विस्तार से चर्चा करने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह बात देश का हर नागरिक जानता है, चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। दंगों से देश को कितना बड़ा नुक्सान हुआ है, उसे समझने के लिये इस सच्चाई को सामने रखिये कि 1947 में भारत के एक रुपये का मूल्य, एक अमेरिकी डॉलर के बराबर था जो अगले दो-तीन सालों में पौने पाँच रुपये हो गया। कारण, सन्‌ सैंतालीस के दंगों के कारण हुए नुक्सान की भरपाई।

हर दंगा देश को कई साल पीछे धकेल देता है। दंगों का खामियाजा हर वर्ग ने उठाया है लेकिन मुस्लिम समाज को दोहरा नुक्सान हुआ है। एक नुक्सान अलग-थलग पड़ जाने का और दूसरा आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन का शिकार बन जाने का। दंगा-मुक्त भारत का लक्ष्य पाने के लिये देश की पूरी जनता एकजुट होकर कोशिश करे और अपने मतभेदों को आपसी बातचीत के ज़रिये सद्‌भावपूर्ण तरीके से सुलझाए। सरकार इस काम को बढ़ावा दे और देश में अमन-चैन बनाए रखने वाले लोगों को प्रतिवर्ष नोबल शान्ति पुरस्कार की तर्ज़ पर सम्मानित करे।

02. रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देना

यह एक हकीकत है कि सरकारी स्तर पर मुस्लिम समाज के प्रति नज़रिया शंकालु है, सरकार से जुड़े लोगों का एक बड़ा तबका मुसलमानों के देशप्रेम को हमेशा शक की निगाहों से देखता है। वहीं मुस्लिम समाज के एक हिस्से के मन में यह अवधारणा है कि सरकार उनके प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण बर्ताव करती है। इस सोच को बदला जाना चाहिये। सरकार मुस्लिम समाज के उत्थान के लिये ईमानदारी से कोशिश करे और इस काम में मुस्लिम समाज के समझदार लोगों का सहयोग भी ले। यह लेख, जिसमें हमने अपने विचार व्यक्त किये हैं, इस दिशा में "मील का पत्थर" बन सकता है। डॉ. वसीम बरेलवी के शब्दों में, सरकार के नाम,

शर्ते-तअल्लुक तय करो,
हम क्या बताएंगे।
तुम्हारे पास दरिया है,
हमारे पास प्यासे हैं।।

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