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क्या है न्यूनतम आमदनी गारंटी योजना?

  • Sat, 16 Feb 2019
  • National
  • Saleem Khilji

देश के 9 उद्योगपतियों की जायदाद, देश के 63 करोड़ लोगों के बराबर है. एक बहुत बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके घर दो वक्‌त भरपेट खा सके, इतना भोजन भी नहीं है. बेरोज़गारी का आलम यह है कि 1 पोस्ट के लिये सैंकड़ों लोग आवेदन कर रहे हैं. लिहाज़ा ऐसी व्‌यवस्था करना ज़रूरी है कि सबको न्यूनतम रोज़गार की गारण्टी मिल सके.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ की एक रैली में 28 जनवरी 2019 को कहा कि आम चुनावों के बाद अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो सरकार न्यूनतम आमदनी योजना शुरू करेगी।

राहुल गांधी ने कहा, "हमने निर्णय लिया है कि हिंदुस्तान के हर गरीब को 2019 के बाद कांग्रेस पार्टी वाली सरकार गारंटी के साथ न्यूनतम आमदनी देगी। इसका मतलब यह है कि देश के हर गरीब के बैंक अकाउंट में न्यूनतम आमदनी आएगी। हिंदुस्तान में न कोई भूखा रहेगा और न कोई गरीब रहेगा। यह हम छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हर राज्य में करेंगे।' राहुल गांधी ने इससे पहले कहा कि वो जो कुछ कहते हैं वो करते हैं। राहुल के इस ऐलान के बाद विरोधियों ने उनसे पूछा है कि सरकार इतने पैसे आखिर कहां से लाएगी?

क्या कांग्रेस अध्यक्ष की ये घोषणा वास्तव में लागू नहीं की जा सकती है? आखिर ये न्यूनतम आमदनी योजना है क्या और इसके लागू करने पर सरकारी खजाने पर कितना भार पड़ेगा?

यह योजना क्या है?

राहुल गांधी ने जिस न्यूनतम आमदनी गारंटी योजना का ज़िक्र किया है, उसमें सरकार लोगों को न्यूनतम आय गारंटी के रूप में देगी। देश के नामी अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला इसे समझाते हुए कहते हैं, "वर्तमान में गरीब के नाम पर जो तमाम सब्सिडियां दी जा रही हैं, जिसमें खाद्य सब्सिडी, खाद सब्सिडी शामिल हैं, उस पर सरकार हर साल 500 लाख करोड़ रुपए खर्च कर रही है। अगर इतनी बड़ी राशि को ही न्यूनतम आमदनी गारंटी में शामिल कर लिया जाए तो बिना अतिरिक्त खर्च के ही यह संभव हो सकता है। इस तरह ये ऐलान सार्थक और सकारात्मक पहल है।' उनका यह भी कहना है कि इस योजना के तहत हर नागरिक को एक मासिक रकम दे दी जाएगी, जिससे उनकी न्यूनतम ज़रूरतें पूरी हो सके और वो भूखा नहीं रह सके। जिस तरह वृद्ध लोगों को पेंशन दी जाती है, वैसे इसे भी लागू किया जा सकता है।

क्या यह कोई नई चीज़ है?

अर्थशास्त्री मनोज पंत राहुल गाँधी की इस घोषणा को नया नहीं बताते हैं। इसे यूनिवर्सल बेसिक इंकम कहते हैं। कुछ साल पहले महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की शुरुआत की गई थी। उसका मतलब भी यही था कि किसानी क्षेत्र में एक तय आमदनी साल में सरकार गारंटी के तौर पर देती है। यह स्कीम भी गारंटी योजना थी। मनोज पंत कहते हैं कि इस पर दो-तीन साल से बहस हो रही है।

कितनी आमदनी दी जाएगी?

सूत्रों के अनुसार काँग्रेस के सत्ता में आने पर प्रति परिवार 8000 रुपये प्रति माह या एक लाख रुपये सालाना की न्यूनतम आय देने की बात कही जा रही है। अगर भाजपा फिर से सत्ता में आ गई तो राहुल गांधी का यह ऐलान रद्दी में जाएगा।

क्या इसे लागू करने से सरकारी खजाना खाली हो जाएगा?

इसका सीधा-सा जवाब यह है कि तेंदुलकर समिति के मुताबिक देश में गरीबों की संख्या कुल आबादी का 25 प्रतिशत थी, यानी करीब 30 करोड़ लोग गरीब हैं। एक परिवार में औसतन 5 आदमी माने जाएं तो 6 करोड़ परिवार होंगे। प्रति परिवार एक लाख रुपये देने पर सालाना 6 लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा और सरकार के दीगर ख़र्चों को देखते हुए ये कोई बहुत बड़ी राशि नहीं है।

न्यूनतम आमदनी गारण्टी के लागू होने का असर यह होगा कि मनरेगा का खर्च बंद हो जाएगा, लोन के खर्चे कम हो जाएंगे और दूसरी योजनाओं पर जो सब्सिडी दी जा रही है, उनका खर्च बंद हो जाएगा। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो राहुल गाँधी का यह बयान मनरेगा योजना को पूरे देश में फैलाने जैसा होगा। मनरेगा सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक सीमित है। इस योजना के बाद शहर भी इसके दायरे में आ जाएंगे।

हाल ही में काँग्रेस ने तीन राज्यों के चुनाव जीतकर सरकार बनाई है। काँग्रेस ने शिक्षित बेरोज़गारों को 3500 रुपये प्रतिमाह "बेरोज़गारी भत्ता" देने का वादा किया था, जिस पर राजस्थान में अमल शुरू हो चुका है। इस नई योजना के लागू करने पर सरकार को बेरोज़गारी भत्ता देने पर खर्च करना नहीं पड़ेगा। राहुल गाँधी ने सत्ता में आने पर सरकारी खर्चों में कटौती करने की भी बात कही है। अगर यह सब किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि इस योजना के क्रियान्वन से खज़ाना खाली होने जैसी कोई समस्या पैदा नहीं होगी।

क्या बेरोजगारी की समस्या खत्म हो जाएगी?

कांग्रेस इससे पहले मनरेगा योजना लेकर आई थी, जिसके ज़रिए गाँवों में 100 दिन के रोज़गार की गारण्टी मिली थी। पिछले चार सालों के दौरान इसके बजट में भाजपा सरकार ने कटौती की है। इसके बाद से ऐसी रिपोर्टें सामने आ रही है कि गांवों में रोजगार की स्थिति बिगड़ी है और नोटबंदी और जीएसटी की वजह से देहातों के छोटे रोजगार प्रभावित हुए हैं। इस वजह से बेरोज़गारी बढ़ी है। इस योजना के लागू किये जाने पर बेरोज़गारी तो खत्म नहीं होगी लेकिन यह कहा जा सकता है कि उसकी वजह से होने वाली भुखमरी की समस्या ज़रूर खत्म हो जाएगी।

इस योजना के साइड-इफेक्ट क्या हो सकते हैं?

इंदिरा गाँधी के ज़माने में भी काँग्रेस "गरीबी हटाओ" के नारे पर चुनाव जीत चुकी है लेकिन यह एक सच्चाई है कि देश से गरीबी नहीं हटी। इस बार राहुल गाँधी के नेतृत्व वाली काँग्रेस गरीबी हटाने की नहीं बल्कि गरीबों की बुनियादी ज़रूरत यानी "दो वक़्त की रोटी" की गारंटी देने की बात कह रही है।

नशे की लत पर खर्च न हो

अगर इस योजना का सही इस्तेमाल हो तो यह बहुत क्रांतिकारी कदम हो सकता है। लेकिन यथार्थ के धरातल पर अगर हम देखें तो पता चलता है कि जहाँ गरीब वर्ग में रोटी सबसे बड़ी समस्या है, वहीं सबसे ज़्यादा नशा करने वाले लोग भी इसी तबके में पाए जाते हैं। अगर हम तलाश करें तो बहुत कम ऐसे मज़दूर मिलेंगे जो बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, ज़र्दा, खैनी, देशी शराब या किसी और किस्म के नशे का आदी न हो। इस योजना का "पहला साइड-इफेक्ट" यह हो सकता है कि पेट भरने के लिये मिली रकम का इस्तेमाल, यह गरीब लोग अपने नशे की ज़रूरतों को पूरा करने में करने लगें। अतः सहायता के लिये दी गई रकम का उपयोग नशे की लत पूरा करने में न हो, उस पर नज़र रखना एक बड़ी चुनौती होगी।

कामचोरी बढ़ने का अंदेशा

हाल ही में यूरोपीय देश फिनलैण्ड में इस प्रकार की एक योजना को बंद किया गया है। वहाँ की सरकार चयनित लोगों को 560 यूरो (करीब 40 हज़ार रु.) प्रति माह दे रही थी। इसका नतीजा यह हुआ कि उन लोगों ने काम की तलाश करना ही बंद कर दिया। भारत में इस योजना का सफल क्रियान्वन सुनिश्चित करने के लिये दो काम किये जाने चाहिये,

01. प्रत्येक गरीब परिवार को खाने-पीने की चीज़ों जैसे गेहूँ, चावल, तेल, दालें आदि के लिये एक निश्चित रकम का भुगतान उसके बैंक खाते में किया जाए ताकि कोई परिवार भूखा न सोए।
02. प्रत्येक परिवार से कम से कम एक बेरोज़गार व्यक्ति को देशसेवा व समाज सेवा के कार्यों का टास्क दिया जाए जैसे मिलिट्री ट्रेनिंग, साफ-सफाई में सहयोग, होमगार्ड की तरह मोहल्लों में चौकीदारी के काम। ऐसा करने से कामचोरी की भावना बढ़ने का अंदेशा नहीं होगा।

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