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इस्लाम में 'खिदमते-खल्क' की अहमियत

  • Tue, 15 Jan 2019
  • Religious
  • Adarsh Muslim Beuro

किसी शख्स की ज़ाती (व्यक्तिगत) ज़रूरत के वक़्त उसका काम कर देना या समाज की सामूहिक ज़रूरतों और सहूलतों को उपलब्ध करने की कोशिश करना, चाहे वो कोशिश माल के ज़रिये हो, चाहे खिदमत और मेहनत के ज़रिये हों. यहाँ तक कि लोगों को नेक काम की तरफ उभारने वाले लेख हों, उन सबका नाम रिफाही काम है जिसे खिदमते खल्क भी कहा जाता है.

इंसान एक-दूसरे की मदद के बगैर एक दिन भी नहीं गुज़ार सकता। उसके तमाम काम और ज़रूरतें समाज के दीगर लोगों के साथ जुड़ी हुई हैं। लिहाज़ा हर फर्द के लिये ये ज़रूरी है कि वो दूसरे लोगों की ज़रूरत, सहूलत और आराम पहुँचाने का ख़याल रखे। उनकी खैरख्वाही करने के लिये अपना माल, अपना वक़्त और अपना आराम भी कुर्बान करने के लिये तैयार रहे। इस्लाम ने भलाई के कामों की बहुत ज़्यादा ताकीद की है।

हदीषों में कुछ रिफाही कामों का ज़िक्र :

01. अल्लाह के रसूल (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने इर्शाद फर्माया, "मोमिन को खुश कर देना, उसका क़र्ज़ उतार देना, उसकी ज़रूरत को पूरा कर देना, उसकी मुसीबत दूर कर देना, ये तमाम काम अफज़ल आ'माल में से हैं।" हदीष के रावी सुफियान कहते हैं, इब्ने मुन्कदिर से कहा गया, "कोई और चीज़ ऐसी बाकी रह गई है जो अच्छी हो।" तो उन्होंने कहा, "भाइयों पर ईषार (त्याग) करना।" (सिलसिलतुल अहादीषुस्सहीहा : 2291, शौबुल ईमान लिल्‌ बैहकी : 7679)

02. नबी (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, "हर रोज़ जब सूरज निकलता है इंसान के हर जोड़ पर सदका वाजिब होता है। दो लोगों के बीच इंसाफ कर देना भी सदका है और किसी की इतनी मदद कर देना कि उसे सवारी पर सवार कर दिया या उसका माल लदवा दिया तो ये भी सदका है। और अच्छी बात कहना भी सदका है और हर वो कदम जो नमाज़ के लिये उठता है वो भी सदका है। और रास्ते से तकलीफ देने वाली चीज़ का हटा देना भी सदका है।' (सहीह मुस्लिम, किताबुज़्‌ज़कात : 2234)

03. हज़रत अनस (रज़ि.) से रिवायत है कि नबी (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'जो कोई मुसलमान पेड़ उगाये या खेती-बाड़ी करे और उससे कोई परिन्दा या इंसान या कोई चौपाया खा ले तो वो उसके लिये सदका ही होता है।' (सहीह बुखारी : 2320, सहीह मुस्लिम : 1553, मुस्नद अहमद : 3/1147)

04. हज़रत जाबिर (रज़ि.) से रिवायत है कि नबी (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'जिसने बंजर ज़मीन आबाद की उसे अज्र मिलेगा और रोज़ी की तलाश में गुज़रने वाले वहाँ से जो-कुछ खायेंगे उसके बदले में उसे अज्र मिलेगा ।' (मुस्नद अहमद : 3/312, नसाई कुबरा : 5756, इब्ने हिब्बान : 5203, सिलसिलतुल अहादीषुस्सहीहा : 1661)

05. हज़रत अदी बिन हातिम (रज़ि.) से रिवायत है नबी (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'जिसने किसी दूसरे आदमी के यतीम बच्चे को अपने साथ मिला लिया और उसे गनी कर दिया तो उसके लिये जन्नत वाजिब हो जाती है।' (तबरानी फिल्‌औसत : 5341, इब्नुल मुबारक फिज़्‌ज़ुहद : 575, मुस्नद अहमद : 4/344, सिलसिला अहादीषुस्सहीहा : 1988)

06. नोमान बिन बशीर (रज़ि.) फर्माते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने इर्शाद फर्माया, 'मुसलमान सब आपस में एक-दूसरे पर रहम करने और दोस्ती रखने और मेहरबानी बरतने में एक जिस्म की तरह हैं जब जिस्म में किसी एक अंग को तकलीफ होती है तो सारे अंगों को चैन नहीं आता और बुखार चढ़ जाता है।' (सहीह बुखारी, किताबुल अदब)

07. रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'जो शख्स बेवाओं और मुहताजों की किफालत के लिये कोशिश करे उसका षवाब इतना है जैसे कोई अल्लाह की राह में जिहाद कर रहा है या रात भर नमाज़ पढ़े या दिन भर रोज़ा रखे।' (सहीह बुखारी)

08. एक शख्स रास्ते पर चल रहा था। उसने रास्ते में एक काँटेदार शाख देखी तो उसे हटाकर एक तरफ कर दिया (ताकि लोगों को तकलीफ न हो) अल्लाह ने उसके अमल की कदर की और उसको बख्श दिया। (सहीह बुखारी : 652, सहीह मुस्लिम : 1914)

09. हज़रत अबू हुरैरह (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'एक शख्स रास्ते में जा रहा था । उसको सख्त प्यास लगी फिर वो एक कुंए पर पहुँचा। उसमें उतरा और पानी पिया। जब पानी पीकर बाहर निकला तो उसने एक कुत्ते को देखा जो प्यास की वजह से गीली मिट्टी चाट रहा था। उसने दिल में कहा, इस कुत्ते को भी प्यास से वैसी ही तकलीफ होगी जैसी मुझ पर गुज़र चुकी है। वो दोबारा कुंए में उतरा और अपने मोज़े में पानी भरकर मुँह से उसको थाम कर बाहर आया और कुत्ते को पानी पिलाया। अल्लाह तआला ने उस शख्स के काम की कदर की और उसको बख्श दिया।' लोगों ने अर्ज़ किया, या रसूलुल्लाह! क्या हमें जानवरों पर रहम करने का षवाब मिलेगा? आप (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'हर ताज़ा कलेजे वाले (मुराद जानवर) पर रहम करने में षवाब मिलेगा।' (सहीह बुखारी, किताबुल अदब)

10. रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'जो शख्स दूसरों पर रहम नहीं करता अल्लाह भी उस पर रहम नहीं करेगा।' (सहीह बुखारी : 2363, सहीह मुस्लिम : 2244)

11. रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'मैं और यतीम की परवरिश करने वाला रोज़े कयामत इस तरह होंगे (फिर आपने बीच वाली दो उंगलियों को मिलाया)।' (सहीह बुखारी, किताबुल अदब)

12. अबू रुकैया तमीम बिन औस दारी से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'दीन खैरख्वाही (का नाम) है।' हमने पूछा, 'किस की खैरख्वाही?' आप (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'अल्लाह की, उसकी किताब की, उसके रसूल की, मुसलमानों के हुक्‌मरानों की और आम मुसलमानों की।' (सहीह मुस्लिम: 55)

13. हज़रत अनस (रज़ि.) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'तुममें से कोई तब तक मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वो अपने भाई के लिये भी वही पसंद न करे जो अपने लिये पसंद करता है।' (सहीह बुखारी, किताबुल ईमान : 13, सहीह मुस्लिम : 45)

14. हज़रत अबू सईद खुदरी (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'तुम रास्तों में बैठने से बचो।' सहाबा (रज़ि.) ने अर्ज़ किया, 'या रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम)! हमारे लिये उन मजलिसों के बगैर चारा नहीं, हम वहाँ बैठकर बातें करते हैं।' रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'अगर तुम्हें वहाँ ज़रूर बैठना ही है तो तुम रास्ते का हक अदा करो।' सहाबा (रज़ि.) ने अर्ज़ किया, रास्ते का क्या हक है? आप (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'निगाहों को नीची रखना, तकलीफ देने वाली चीज़ को रास्ते से हटा देना, सलाम का जवाब देना, नेकी का हुक्‌म देना, बुराई से रोकना।' (सहीह बुखारी : 2465, सहीह मुस्लिम : 2121)

15. हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'मुसलमान मुसलमान का भाई है, न उस पर ज़्यादती करता है, न उसे (बेयारो-मददगार छोड़कर दुश्मन के) सुपुर्द करता है। जो अपने (मुसलमान) भाई की हाजत पूरी करने में लगा हो अल्लाह तआला उसकी हाजत पूरी करता है, जो किसी मुसलमान की कोई परेशानी दूर करता है अल्लाह तआला उसकी वजह से उसकी कयामत की परेशानियों में से कोई (बड़ी) परेशानी दूर कर देगा और जिसने मुसलमान की पर्दापोशी की, अल्लाह तआला कयामत वाले दिन उसकी पर्दापोशी करेगा।' (सहीह बुखारी : 2442, सहीह मुस्लिम : 2580)

16. हज़रत अबू हुरैरह (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'हर दिन जिसमें बन्दे सुबह करते हैं दो फरिश्ते उतरते हैं, उनमें से एक कहता है, ऐ अल्लाह खर्च करने वालों को उसका बदल अता कर और दूसरा कहता है, ऐ अल्लाह! रोककर रखने वाले (के माल) को बर्बाद कर दे।' (सहीह बुखारी : 1442, सहीह मुस्लिम : 1010)

17. इब्ने मसऊद (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लललाहु अलैहि व सल्लम) ने फर्माया, 'सिर्फ दो आदमियों पर रश्क करना जाइज़ है। एक वो आदमी जिसको अल्लाह ने माल दिया और फिर उसे हक की राह में खर्च करने की हिम्मत व तौफीक दी। दूसरा वो आदमी जिसे अल्लाह ने हिकमत व इल्म से नवाज़ा पस वो उसके साथ ही फैसला करता और दूसरों को भी उसकी ता'लीम देता है।' (सहीह बुखारी : 73, सहीह मुस्लिम : 816)

 

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