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चुनाव में मोहरा बनने से बचें

  • Sat, 16 Mar 2019
  • National
  • Saleem Khilji

लोकसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान हो चुका है। चुनाव चाहे लोकसभा के हों, या विधानसभाओं के; हमेशा चुनाव-प्रचार की शुरूआत विकास और देश व जनहित से जुड़े मुद्दों से होती है लेकिन जैसे-जैसे मतदान की तारीखें करीब आती हैं, हिन्दू-मुस्लिम से जुड़े मुद्दे मिषाल के तौर पर श्मसान-कब्रिस्तान,रमज़ान-दीवाली, मुस्लिम तुष्टिकरण, लव जिहाद, जिन्ना की तस्वीर, गौहत्या, आदि चुनाव के प्रमुख मुद्दे बना दिये जाते हैं। सोशल मीडिया पर मुस्लिम समाज और उससे जुड़ी बातों को "टार्गेट" करके झूठा प्रोपेगण्डा चलाया जाता है। हमेशा यह देखा गया है कि मुसलमान जाने-अनजाने में इन मुद्दों के जाल में फंस जाता है और "शिकारी" कामयाब हो जाते हैं।

अब तीन तलाक के मुद्दे को ही लीजिये। यह कोई राजनीतिक मसला नहीं है। लेकिन मुस्लिम समाज में जारी शरीअत से जुड़े इस मसले को चुनाव प्रचार में वो पार्ट अपना चुनावी मुद्दा बनाती है जो "हिन्दुत्व" की झण्डाबरदार है। हैरत तो तब होती है जब मुसलमान उनसे यह सवाल नहीं करता कि साहेब! कुर्आन में शराब पीना भी वर्जित है, कोई कानून बनाकर उस पर भी तो रोक लगाइये। कई मामलों में ऐसा देखा गया कि शराब और दीगर नशीली चीज़ों की वजह से औरतों की, खास तौर पर मुस्लिम औरतों की जि़ंदगी जहन्नम बनी हुई है। लेकिन एनजीओ चलाने वाली उन पढ़ी-लिखी मुस्लिम औरतों ने शराब पीने-पिलाने, बनाने-बेचने पर पाबंदी लगाने की माँग को लेकर कोर्ट में कभी कोई मुकद्दमा दायर नहीं किया, जो तीन तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट तक गईं।

एक पार्ट जब बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की समस्याओं जैसे मुद्दों पर बैकफुट पर आने लगती है तो उसके नेता फौरन एक "जुमला" उछाल देते हैं कि अगर उनकी पार्ट चुनाव हारी तो "पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे।" कोई उनसे सवाल नहीं करता जब उस पार्ट के शिरोमणी नेता 56 इंच का सीना तानकर "हुँकार भरते" हुए "मियाँ मुशर्रफ" या "मियाँ इमरान खान" को हड़काते हैं।

असल में उनका निशाना भारतीय मुसलमान होते हैं जिनको हमारे देश में आम ज़बान में "मियाँ भाई" कहा जाता है। अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय मुसलमानों का सम्बंध पाकिस्तान से जोड़कर, देश की बहुसंख्यक जनता का ध्यान उनकी असली समस्याओं से हटा दिया जाता है। हमने इन नेताओं से नहीं कहा कि साहेब! आप मियाँ शब्द का इस्तेमाल किये बिना भी पाकिस्तान के राष्ट्र­पति, प्रधानमंत्री, सैनाध्यक्षों को हड़का सकते हैं, हम भी आपके साथ हैं। चुनाव तो दो महीने में खत्म हो जाएंगे, देशवासियों को हमेशा साथ रहना है। इसलिये स्वार्थ नेताओं का मोहरा न बनें।

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