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अनिल अम्बानी की बर्बादी का ज़िम्मेदार कौन?

  • Fri, 01 Mar 2019
  • National
  • Adarsh Muslim Beuro

रिश्तों की संवेदना, सहती सदा उपहास । भाई पर से अब उठा, भाई का विश्वास ।। कुछ ऐसी ही कहानी है अम्बानी परिवार की. सन्‌ 2005 में धीरुभाई अम्बानी की विरासत के बंटवारे के बाद अनिल अम्बानी, अपने बड़े भाई मुकेश अम्बानी से किस तरह पिछड़ते गये? इस बार की स्पेशल रिपोर्ट में हम यही जानने की कोशिश करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने आरकॉम यानी रिलायंस कम्युनिकेशंस के अध्यक्ष अनिल अंबानी को जानबूझ कर उसके आदेश का उल्लंघन करने और टेलिकॉम उपकरण बनाने वाली कंपनी एरिक्सन को 550 करोड़ रुपये बकाया भुगतान नहीं करने पर 20 फरवरी 2019 को अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया। कोर्ट ने सख्ती से कहा कि एरिक्सन को 4 हफ़्ते में 453 करोड़ रुपये चुकाने होंगे। तय समय में भुगतान नहीं करने पर उन्हें तीन महीने जेल की सजा भुगतनी होगी।

एरिक्सन इंडिया ने आरोप लगाया था कि रिलायंस ग्रुप के पास रफाल विमान सौदे में निवेश के लिए रकम है, लेकिन वे उसके 550 करोड़ के बकाए का भुगतान करने में आनाकानी कर रहे हैं। अनिल अंबानी ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि उनके बड़े भाई मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस जियो के साथ संपत्तियों की बिक्री का सौदा नाकाम होने के बाद उनकी कंपनी दिवालियेपन के लिए कार्यवाही कर रही है, ऐसे में रकम पर उसका नियंत्रण नहीं है। इस सम्बंध में हम "आदर्श मुस्लिम" के पिछले अँक (16-28 फ़रवरी 2019) की कवर स्टोरी "नाकाम कारोबारी को रक्षा सौदा क्यों?" में विस्तार से जानकारी दे चुके हैं।

यह नौबत क्यों आई?

अगर बड़े भाई मुकेश के साथ अनिल की बात बन जाती तो शायद उन्हें यह दिन देखना नहीं पड़ता। लेकिन, मुकेश अंबानी ने छोटे भाई अनिल अंबानी के पुराने क़र्ज़ को चुकाने से इनकार कर दिया और अनिल के दिन फिरने की सारी उम्मीदें धूमिल हो गईं। जियो ने टेलिकॉम डिपार्टमेंट को एक पत्र लिखकर सरकार से यह आश्वासन मांगा था कि उसे आरकॉम के पुराने कर्जे चुकाने को नहीं कहा जाएगा। इसी पत्र ने सब किए-धरे पर पानी फेर दिया। मुकेश के मुकरने के बाद टेलिकॉम डिपार्टमेंट ने अनिल को आरकॉम के स्पेक्ट्रम ऐसेट्‌स रिलायंस जियो को बेचने की अनुमति नहीं दी जिससे अनिल को 23 हज़ार करोड़ रुपये मिल सकते थे।

सुप्रीम कोर्ट भी आरकॉम की ऐसेट्‌स की बिक्री नहीं हो पाने का जिम्मेवार टेलिकॉम डिपार्टमेंट को नहीं बल्कि मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो को मानता है। सुप्रीम कोर्ट ने टेलिकॉम डिपार्टमेंट को निर्देश दिया था कि वह बैंक गारंटी की जगह कॉर्पोरेट गारंटी लेकर आरकॉम को अपना स्पेक्ट्रम जियो के हाथों बेचने के साथ-साथ स्पेक्ट्रम यूजर चार्ज (एसयूसी) के एवज में आरकॉम ग्रुप की कंपनी की जमीन बेचने की अनुमति दे दे।

लड़ाई के बाद हुआ था बंटवारा

देश के बड़े कारोबारी धीरुभाई अम्बानी की मौत 2002 में हुई थी। उनकी मौत के बाद उनकी विरासत को लेकर उनके दोनों बेटों में इस कदर जंग छिड़ी कि वो मीडिया की सुर्खियाँ बनीं। आखिर उन दोनों की माँ कोकिलाबेन ने दोनों बेटों के बीच "सेटलमेंट" कराया। श्रीमती अंबानी ने कहा था, "मुकेश के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और आईपीसीएल की ज़िम्मेदारी होगी, जबकि अनिल के पास रिलायंस इंफोकॉम, रिलायंस एनर्जी और रिलायंस कैपिटल की ज़िम्मेदारी होगी। मेरे पति की दूरदर्शिता और आशीर्वाद, संयुक्त मूल्यों के लिये उनको नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करने के लिये उनका मार्गदर्शन करेंगे।"

2007 ! अंबानी बंधुओं यानी मुकेश और अनिल में बँटवारे को दो साल हो गए थे। इस साल की फ़ोर्ब्स की अमीरों की सूची में दोनों भाई, मुकेश और अनिल काफी ऊपर थे। इस सूची के मुताबिक बड़े भाई मुकेश, 49 अरब डॉलर के और छोटे भाई अनिल अंबानी 45 अरब डॉलर के मालिक थे। दोनों के बीच बहुत-ज़्यादा बड़ा फर्क नहीं था।

2008 में कई लोगों का मानना था कि छोटा भाई अपने बड़े भाई से आगे निकल जाएगा, खास तौर पर रिलायंस पावर के पब्लिक इश्यु आने से पहले। 2005 मेंजब भाइयों के बीच बँटवारा हुआ तो मुकेश के हिस्से में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ आई जो ग्रुप की सबसे बड़ी और भारी मुनाफा देने वाली कम्पनी थी। अनिल के हाथ में टेलीकॉम आया जिसके भरपूर विस्तार की संभावना थी लेकिन इसमें भारी शुरूआती निवेश की भी ज़रूरत थी। रिलायंस पावर कोई बहुत बड़ी कंपनी नहीं थी और इसे चलाने के लिए भी काफी पूंजी चाहिए थी। रिलायंस कैपिटल फायदे का धंधा ज़रूर थी लेकिन बड़े भाई के हिस्से आई रिलायंस इंडस्ट्रीज़ से उसकी तुलना नहीं की जा सकती थी।

मुकेश का बिज़नेस पैसे बना रहा था जबकि अनिल के बिज़नेस को बढ़ने के लिए पैसों की ज़रूरत थी। अनिल एक बार जो फिसले तो बस फिसलते ही चले गए। इसकी एक बड़ी वजह ये थी कि उनके पास ऐसा कोई धंधा नहीं था जिससे लगातार कैश आता।

जब बड़ा भाई वादे से मुकरा

अनिल अंबानी ने बंटवारे के वक़्त एक शर्त मनवाई थी कि रिलायंस इंडस्ट्रीज़ से अनिल की कंपनी को गैस मिलती रहेगी। गैस की जो कीमत तय की गई वो बेहद सस्ती थी, इस तरह अनिल अंबानी ने अपने पावर प्लांट्स के लिए सस्ते कच्चे माल का इंतज़ाम कर लिया था। गैस की सस्ती कीमत वह जादू की छड़ी थी जिसकी वजह से उन्हें भारी मुनाफा होने की उम्मीद थी। लेकिन यह अनिल की बदनसीबी थी कि उनकी वह योजना राजनीति और अदालतों की चपेट मेंआ गई। केंद्र सरकार और उनके बड़े भाई मुकेश उन्हें अदालत में घसीट ले गए।

2010 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि तेल और गैस राष्ट्रीय संपदा हैं, उन्हें किसे और किस कीमत पर बेचा जाए इसका निर्णय करने का अधिकार सिर्फ सरकार को है। कोर्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को आदेश दिया कि वह बिजली बनाने वाली बाकी कंपनियों को भी गैस बेचे। इस फैसले से अनिल अंबानी को गहरा धक्का लगा। वे बाज़ार से महंगी कीमत पर तेल व गैस खरीदने पर मजबूर हुए जिसकी वजह से मुनाफा कमाने के मंसूबे नाकाम हो गए।

गैस वाले मामले पर अदालत के फैसले और रिलायंस पावर के शेयरों के भाव गिरने से अनिल की राह मुश्किल होती गई। ऐसी हालत में अनिल अंबानी के पास देसी और विदेशी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से क़र्ज़ लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। 2000 से 2010 के बीच जहां बड़ा भाई कारोबार में आगे बढ़ता गया, वहीं छोटे भाई की कंपनियों पर क़र्ज़ चढ़ता गया। आज हालत ये है कि उनकी एक कंपनी ने दिवालिया घोषित किए जाने की अर्ज़ी लगा रखी है।

जब धीरुभाई जिंदा थे तो अनिल अंबानी को वित्त बाज़ार का स्मार्ट खिलाड़ी माना जाता था, उन्हें मार्केट वैल्यूएशन की आर्ट और साइंस दोनों का माहिर माना जाता था। उस दौर में बड़े भाई के मुकाबले इनकी शोहरत ज़्यादा थी। धीरुभाई के ज़माने में वित्तीय मामले अनिल और औद्योगिक मामले मुकेश संभालते थे।

बंटवारे की लड़ाई के दौरान दोनों भाइयों ने एक-दूसरे पर हर तरह के हमले किए थे। यहाँ तक कि सरकार और मीडिया में भी कुछ समय तक दो खेमे हो गए थे। लेकिन धीरे-धीरे मुकेश अंबानी ने मीडिया और शासन-तंत्र से जुड़े लोगों को अपने पक्ष में कर लिया। ज़्यादातर प्रभावशाली नेताओं, अफसरों और मीडिया कॉर्पोरेटर्स ने अनिल अम्बानी के मुकाबले मुकेश का साथ देने का फैसला किया। इस लड़ाई मेंअनिल अंबानी पिछड़ गये।

एक्सटर्नल एलीमेंट यानी अपने नियंत्रण से बाहर की चीज़ों को प्रभावित करने का काम बंटवारे से पहले अनिल अंबानी किया करते थे। वे इसमें खासे कामयाब भी थे लेकिन बंटवारे के बाद, खास तौर पर 2010 के बाद से अनिल का पहले वाला जलवा नहीं रह गया। आज जो हालात हैं, उनके लिए एक हद तक अनिल खुद ज़िम्मेदार हैं, तो कुछ हद तक परिस्थितियां ज़िम्मेदार हैं जो किसी के बस में नहीं हैं।

पावर और टेलीकॉम सेक्टर में अनिल को घाटा हुआ है। इन दोनों कम्पनियों की बदहाली के लिये काफी हद तक उनके बड़े भाई मुकेश ज़िम्मेदार हैं। सस्ती गैस सप्लाई करने के वादे से जब वो मुकरे तो रिलायंस पावर डूबी और जब उन्होंने मोबाइल सेक्टर में सस्ते टैरिफ के साथ रिलायंस जियो लाँच की तो अनिल की मोबाइल कम्पनी बर्बाद हो गई।

लेकिन उनकी दो अन्य कम्पनियां रिलायंस कैपिटल और रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर अच्छी हालत में हैं, इसलिए यह मानना गलत होगा कि वे खेल से एकदम बाहर हो गए हैं। लेकिन उनका आकार बड़ा करना, अनिल के लिये चुनौती होगी।

बहरहाल, हम लौटते हैं 2019 में। फ़ोर्ब्स की 2018 की रिच लिस्ट के मुताबिक, मुकेश अंबानी की दौलत में मामूली कमी हुई है। वे अब 47 अरब डॉलर के मालिक हैं। उनकी दौलत में 2 अरब डॉलर की कमी आई है लेकिन 12 साल पहले 45 अरब डॉलर के मालिक अनिल अंबानी अब 2.5 अरब डॉलर के मालिक रह गए हैं। ब्लूमबर्ग इंडेक्स तो उनकी दौलत को सिर्फ 1.5 अरब डॉलर ही आंक रहा है।

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