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आखिर अयोध्या मसले का हल क्या हो?

  • Sat, 16 Mar 2019
  • National
  • Saleem Khilji

जब देश आज़ाद हुआ था तब हमारे नेताओं ने, जाति-धर्म का भेद भुलाकर, आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी. उन्होंने आज़ादी के बाद भारत को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाया. संविधान के ज़रिए देश की सभी धर्मों को मानने वाली जनता को आश्वासन दिया गया कि उनके धार्मिक विश्वास व धार्मिक स्थलों का सम्मान किया जाएगा. बदकिस्मती से स्वार्थ तत्वों ने देश में ऐसे हालात बनाए कि आपसी सद्‌भाव अनेक बार तार-तार हुआ. अब ये खेल खत्म होना चाहिये.

खुदा निगहबान हो तुम्हारा, धड़कते दिल का पयाम ले लो,
तुम्हारी दुनिया से जा रहे हैं, उठो हमारा सलाम ले लो ।
उठे जनाज़ा जो कल हमारा, कसम है तुमको न देना काँधा,
रहे सलामत तुम्हारी खुशियाँ, इन आँसुओं का पयाम ले लो।

6 दिसम्बर 1992 की सुबह, बाबरी मस्जिद के गुम्बदों से शायद यही आवाज़ आ रही थी। लेकिन ये आवाज़ किसी ने नहीं सुनी।

* एक राज्य सरकार ने अपने उस वचन को तोड़ दिया, जो उसने अदालत को दिया था कि मस्जिद इमारत की रक्षा की जाएगी।
* एक केंद्र सरकार ने उस वादे को भुला दिया जो उसने देश की जनता को दिया था कि बाबरी मस्जिद दोबारा उसी स्थान पर बनाई जाएगी।
* 26 साल बीत जाने के बाद भी अदालत उन लोगों को सज़ा नहीं दे पाई, जिन्होंने दिन-दहाड़े बाबरी मस्जिद को ज़मींदोज़ कर दिया था।

फिर भी मुसलमानों ने अदालत पर भरोसा किया कि उनके साथ न्याय होगा। आज भी मुसलमानों को देश की अदालत पर भरोसा है कि उसके साथ देर से ही सही, मगर इंसाफ होगा। ये इस्लाम के मानने वाले लोग हैं, जिनका धर्म उन्हें सबकी सलामती चाहने का पैगाम देता है। ये वो लोग हैं जो "दुनिया वालों की ताकत पर नहीं, दुनिया बनाने वाले की ताकत पर भरोसा" रखते हैं। इन मुसलमानों की धार्मिक किताब कुर्आन में लिखा है, "वस्सुल्हु खैर(सुलह बेहतर है)।' अल्लाह की यही किताब कहती है कि विरोधी पक्ष से वादाखिलाफी का अंदेशा हो तब भी अल्लाह पर भरोसा करते हुए सुलह कर लो; अगर वो सुलह का पैगाम दे।

क्या बाबरी मस्जिद के मामले में सुलह की जा सकती है? अगर हाँ तो किन शर्तों पर की जा सकती है? ये बहुत बड़े सवाल हैं; हम खुद को इस काबिल तो नहीं समझते कि इसका जवाब देने की कोशिश करें लेकिन मीडिया से जुड़े होने के कारण मुस्लिम समाज से जुड़े इस जज़्बाती मसले पर अपनी राय रखने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी सोच है कि बहुत से मामले अदालत तय नहीं कर सकती इसलिये ऐसे मामले आपसी बातचीत से ही सुलझाए जाने चाहिये। हमारी नज़र में इस विवाद का समाधान ऐसे किया जा सकता है। मुस्लिम समाज के ज़िम्मेदारान सरकार से निम्नलिखित बातों की माँग करें,

01.देश के संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया है। अल्पसंख्यकों को उनकी संस्कृति बचाए रखने की गारण्टी भी दी है। लेकिन पिछले कुछ बरसों में "लैंगिक समानता के अधिकार" की आड़ में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर चोट की जा रही है । अतः

मुस्लिम समाज यह माँग करे कि केंद्र सरकार "मुसलमानों की मज़हबी पहचान के संरक्षण" के लिये कानून बनाए।
* इस कानून में यह स्पष्ट किया जाए कि मुसलमानों के धार्मिक व पारिवारिक मामले "शरीअत" की रोशनी में हल किये जाएंगे; और किसी अन्य कानून के ज़रिए शरीअत की पालना के अधिकार से उनको वंचित नहीं किया जाएगा।
* अगर किसी व्यक्ति -चाहे मर्द हो या औरत- को अगर शरीअत के किसी प्रावधान से आपत्ति हो तो वो इस्लाम धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाने के लिये स्वतंत्र होगा, मगर किसी ऐसे व्यक्ति की माँग पर शरीअत में दखल नहीं दिया जाएगा।

02.इसके बदले मुस्लिम समाज, अधिग्रहित 67 एकड़ ज़मीन के उस छोर, जो फैज़ाबाद जाने वाले नेशनल हाइवे-28 से लगता है, पर बाबरी मस्जिद को शिफ्ट करने पर समझौता कर ले। ऐसा करने पर साम्प्रदायिक सद्‌भाव बना रहेगा, झगड़े की स्थिति समाप्त हो जाएगी। साथ ही मुख्य सड़क से जुड़ी होने के कारण मस्जिद में नमाज़ियों को आने में भी सहूलत होगी। इसके लिये इस लेख के साथ दिये गये 67 एकड़ ज़मीन के नक़्शे को देखिये।

03."उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991" की पूरी तरह से पालना सुनिश्चित की जाए, जिसके तहत बाबरी मस्जिद -राम जन्मभूमि मामले के अलावा सभी धर्मस्थलों के सम्बंध में 15 अगस्त 1947 वाली स्थिति कायम रखने की गारंटी दी गई है।

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